नई दिल्ली में छात्र आंदोलन की गूंज अब संसद तक पहुंच चुकी है। देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार ने सोमवार को लोकसभा में पेपर लीक विरोधी कानून को और कठोर बनाने वाला विधेयक पेश किया।
हमने विधेयक के प्रावधानों का अध्ययन किया। दोषी पाए जाने पर अब दस साल तक की जेल हो सकती है। जुर्माना बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है।
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने विधेयक पेश किया। उस समय लोकसभा में भारी शोर था। विपक्षी सांसद दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाब मांग रहे थे।
पेपर लीक के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को एक बड़ी राजनीतिक सफलता मिली है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को पद छोड़ दिया।
जांच के लिए केवल दो महीने
‘लोक परीक्षा अनुचित साधन निवारण संशोधन विधेयक, 2026’ के जरिये 2024 के मूल कानून में बदलाव किया गया है।
नए प्रावधान के अनुसार पेपर लीक मामले की जांच दो महीने में पूरी करनी होगी। पहले व्यक्तिगत अपराधियों के लिए तीन से पांच साल की जेल का प्रावधान था। अब सजा की अवधि पांच से दस साल कर दी गई है।
जुर्माना भी कई गुना बढ़ा है। पहले इसकी सीमा 10 लाख रुपये थी। अब दोषी व्यक्ति पर 50 लाख रुपये तक का दंड लगाया जा सकेगा।
संगठित गिरोह के शामिल होने पर कानून और तीखा होगा। ऐसे अपराध में कम से कम सात साल की जेल प्रस्तावित है। जुर्माना 10 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
मसौदे में 15 गतिविधियों को अपराध माना गया है। इनमें प्रश्नपत्र लीक करना, ओएमआर शीट से छेड़छाड़, फर्जी वेबसाइट बनाना और नकली प्रवेश पत्र जारी करना शामिल है।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने का अधिकार मिलेगा। आरोपपत्र दाखिल होने के तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
केंद्र सरकार कुछ गंभीर मामलों की जांच के लिए विशेष कार्यबल भी गठित कर सकेगी।
नारों के बीच पेश हुआ विधेयक
जब विधेयक लोकसभा में रखा गया, सदन में तीखा हंगामा चल रहा था। विपक्षी सांसद दिल्ली के प्रदर्शन में पुलिस की कथित ज्यादतियों के खिलाफ नारे लगा रहे थे।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सांसदों से बहस में भाग लेने को कहा। उन्होंने इसे सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था सुधारने की दिशा में पहला कदम बताया।
बिरला ने कहा कि सांसद नारे लगाने के बजाय विधेयक पर चर्चा करें। सरकार विपक्ष की ओर से सुझाए गए उपयोगी बदलावों पर विचार करेगी।
विरोध थमा नहीं। अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही दोपहर दो बजे तक स्थगित कर दी। सदन दोबारा बैठा तो नारे फिर गूंजने लगे। कार्यवाही शाम पांच बजे तक रोकनी पड़ी।
मानसून सत्र पर आंदोलन की छाया
मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था। पहला सप्ताह लगभग पूरी तरह विरोध प्रदर्शनों की भेंट चढ़ गया।
छात्र और विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। दिल्ली के जंतर-मंतर समेत कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए। विपक्षी दल भी आंदोलनकारियों के साथ खड़े दिखाई दिए।
दबाव बढ़ता गया। शनिवार को प्रधान ने पद छोड़ दिया।
अब विपक्ष ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया है। दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है। विपक्ष का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई में पैलेट गन जैसे कठोर साधनों का इस्तेमाल किया गया।
सरकार इस विवाद के बाद रक्षात्मक स्थिति में दिख रही है। उसने इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक कार्यबल बनाने की घोषणा की है।
यह कार्यबल सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार सुझाएगा। लक्ष्य साफ है—प्रश्नपत्रों को गिरोहों की पहुंच से दूर रखना और छात्रों का टूटा भरोसा फिर से कायम करना।
