नई दिल्ली में नीट परीक्षा विवाद के खिलाफ भड़के छात्र आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शनकारी कई दिनों से उनके पद छोड़ने की मांग कर रहे थे।
प्रधान ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक लंबा बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि इस्तीफा उनके निजी सम्मान या प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। उनके अनुसार, छात्रों का भविष्य बचाना अधिक जरूरी है।
हमारे सामने यह मोदी सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री के इस्तीफे का दुर्लभ मामला है। लगातार सड़क पर उतरे युवाओं, बढ़ते जनदबाव और राजनीतिक हमलों के बाद यह फैसला आया।
प्रधान ने कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन का लाभ ऐसी ताकतें न उठाएं, जो देश के हितों के खिलाफ काम करती हैं। उन्होंने अपने फैसले को व्यापक राष्ट्रीय हित से जोड़ा।
तीसरे दौर की वार्ता से पहले इस्तीफा
प्रधान ने केंद्र सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी, यानी सीजेपी, के बीच तीसरे दौर की बातचीत से कुछ घंटे पहले इस्तीफा दिया।
वार्ता से पहले सीजेपी नेताओं ने साफ कहा था कि प्रधान का इस्तीफा उनकी अटल मांग है। इस पर कोई समझौता नहीं होगा।
घोषणा सामने आते ही जंतर-मंतर पर खुशी की लहर दौड़ गई। यही वह स्थान है, जहां सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया था। धीरे-धीरे यह मैदान हजारों नाराज छात्रों का ठिकाना बन गया।
इंडिया टुडे से जुड़े सूत्रों के अनुसार, प्रधान को मंत्रिमंडल से हटाया नहीं गया। उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए स्वयं इस्तीफा दिया। सरकार भी उन्हें सम्मानजनक विदाई देना चाहती थी।
ओडिशा से आने वाले भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान ने 2021 में शिक्षा मंत्रालय संभाला था। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें दोबारा यही जिम्मेदारी दी गई।

इस्तीफे में प्रधान ने क्या कहा?
परीक्षा प्रश्नपत्र लीक की लगातार घटनाओं ने प्रधान को कठघरे में खड़ा कर दिया था। मई में सामने आया नीट-यूजी पेपर लीक विवाद उनके लिए निर्णायक झटका बना।
अपने पत्र में प्रधान ने लिखा कि पिछले दस दिनों की घटनाओं ने उन्हें भीतर तक दुखी किया है। उन्होंने दोहराया कि मामला निजी प्रतिष्ठा का नहीं है।
उनके शब्दों में, भारत के युवा ही देश की वास्तविक शक्ति हैं।
प्रधान ने दावा किया कि उन्होंने पहले दिन से नीट पेपर लीक मामले की जिम्मेदारी स्वीकार की। उन्होंने कहा कि वे संकट से पीछे नहीं हटे।
उन्होंने परीक्षा माफिया पर भी तीखा हमला किया। प्रधान के अनुसार, किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का भविष्य ऐसे गिरोहों के हाथों बर्बाद नहीं होने दिया जाना चाहिए।
उनका संकेत 20 जुलाई की हिंसा की ओर भी था। संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और पुलिस के बीच हुई झड़पों में 180 से अधिक प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
प्रधान ने कहा कि पूरे घटनाक्रम पर विचार करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेज दिया।
उन्होंने लिखा कि किसी एक छात्र का भविष्य भी कानूनी उलझनों में नहीं फंसना चाहिए। बच्चे पढ़ाई पर लौटें। वे अपने करियर को संवारें। देश की एकता भी सुरक्षित रहे।
प्रधान ने यह आशंका भी जताई कि आंदोलन की आड़ में राष्ट्रविरोधी ताकतें सक्रिय हो सकती हैं।
उनकी टिप्पणी को विपक्ष और कांग्रेस पर परोक्ष प्रहार माना जा रहा है। इसी सप्ताह राहुल गांधी और कई कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के आवास के बाहर अचानक प्रदर्शन किया था। पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रधान ने शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ईमानदारी से काम किया और लाखों विद्यार्थियों को अपने फैसलों के केंद्र में रखा।
जंतर-मंतर पर जश्न
इस्तीफे की खबर फैलते ही जंतर-मंतर नारे, तालियों और उत्साह से गूंज उठा।
करीब एक महीने तक चला आंदोलन अंततः सरकार पर दबाव बनाने में सफल रहा। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि यह आंदोलन किसी बड़े विपक्षी दल के सहारे खड़ा नहीं हुआ। इसे छात्रों और आम नागरिकों ने आगे बढ़ाया।
सीजेपी ने एक्स पर लिखा, “कॉकरोच जीते, लोकतंत्र जीता।”
पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसा। उन्होंने लिखा, “सुबह हो गई मामू।” यह फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में संजय दत्त के चर्चित संवाद का संदर्भ था।
दिपके ने साफ किया कि आंदोलन अभी समाप्त नहीं होगा।
सीजेपी की दो मांगें अब भी बाकी हैं। संगठन नीट अभ्यर्थियों की आत्महत्या के बाद उनके परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग कर रहा है। वह 20 जुलाई की कथित पुलिस बर्बरता में शामिल अधिकारियों पर कार्रवाई भी चाहता है।
सोनम वांगचुक ने इस्तीफे को सड़क से निकली प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक जीत बताया।
वांगचुक ने शुक्रवार को अपना अनशन समाप्त किया था। सरकार ने भरोसा दिया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा। उन्होंने इसे भारत के युवाओं और छात्रों की जीत बताया।
कैसे बढ़ा सरकार पर दबाव?
हमने पिछले दिनों जंतर-मंतर पर आंदोलन को तेजी से फैलते देखा। सरकार इसके आकार और गति का सही आकलन नहीं कर सकी।
वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाने और 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद भी भीड़ कम नहीं हुई। छात्र, अभिभावक, शिक्षक और दूसरे नागरिक लगातार जंतर-मंतर पहुंचते रहे।
आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे स्वतःस्फूर्त बन गया। परीक्षा व्यवस्था और सरकारी नीतियों को लेकर दबा आक्रोश खुलकर सामने आया।
गुरुवार को केंद्र ने हालात संभालने की कोशिश तेज की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से सीधा संवाद किया। उन्होंने पेपर लीक के आरोपियों के मुकदमों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने की घोषणा की।
इस आश्वासन से प्रदर्शनकारी शांत नहीं हुए।
सीजेपी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी रही।
आंदोलन ने मध्य दिल्ली के सामान्य जीवन को भी प्रभावित किया। सुरक्षा कारणों से केंद्रीय दिल्ली के 18 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए। इतनी बड़ी संख्या में स्टेशनों का एक साथ बंद होना असाधारण था।
यात्रियों को भारी परेशानी हुई। जनाक्रोश और गहरा गया।
बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने शिक्षा सचिव को पद से हटा दिया। मई में नीट-यूजी पेपर लीक सामने आने के बाद किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ यह पहली बड़ी कार्रवाई थी।
आधी रात से कुछ पहले प्रधानमंत्री मोदी ने फिर छात्रों को संबोधित किया। एक सेल्फी वीडियो में उन्होंने कहा कि पेपर लीक के खिलाफ और कठोर कार्रवाई होगी।
उन्होंने सार्वजनिक परीक्षा अनुचित साधन निवारण अधिनियम में संशोधन की घोषणा भी की। प्रस्तावित बदलावों में प्रश्नपत्र लीक के लिए अधिक सख्त दंड शामिल किए जाएंगे।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी। सरकार इसे अगले सप्ताह संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है।
