वोल्कर तुर्क ने तनाव घटाने और राजनीतिक संवाद शुरू करने की अपील की। चुनाव से पहले हिंसा ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है।
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में बढ़ती हिंसा अब संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में है। जून से अब तक झड़पों में कम से कम 31 लोग मारे गए हैं। महीने के अंत में क्षेत्रीय चुनाव होने हैं। उससे पहले सड़कों पर तनाव गहरा गया है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने शुक्रवार को इस्लामाबाद से स्वतंत्र जांच कराने को कहा। उन्होंने हर नागरिक और सुरक्षाकर्मी की मौत की तेज, विस्तृत और निष्पक्ष जांच की मांग रखी।
हम इस संकट में महंगाई, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी शक्ति का तीखा टकराव देखते हैं।
विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी, यानी JAAC, कर रही है। यह व्यापारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का साझा संगठन है।
JAAC का आंदोलन भोजन की बढ़ती कीमतों और बिजली-पानी के महंगे शुल्क के खिलाफ शुरू हुआ था। अब विवाद विधानसभा की आरक्षित सीटों पर अटक गया है। ये सीटें कश्मीरी शरणार्थियों के लिए तय हैं।
JAAC इन सीटों को समाप्त करना चाहती है। संगठन का दावा है कि इस व्यवस्था से क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोग स्थानीय चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
पाकिस्तान सरकार ने JAAC को आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित “आतंकवादी” संगठन घोषित कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने इस फैसले पर गंभीर चिंता जताई।
यूएन अधिकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को आतंकवाद से जोड़ना नागरिक अधिकारों को कुचल सकता है। बड़े पैमाने पर इंटरनेट बंद करना भी लोगों की आवाजाही, संगठन बनाने और अपनी बात कहने की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है।
हिंसा का सबसे खूनी दौर 14 जुलाई को सामने आया। पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार, पुंछ डिवीजन में JAAC के प्रस्तावित “लॉन्ग मार्च” से पहले सुरक्षा बलों ने सड़क अवरोध हटाने की कोशिश की।
इसके बाद उग्र झड़पें भड़क उठीं। नौ लोगों की जान गई। मृतकों में सात नागरिक कार्यकर्ता और दो कानून-व्यवस्था अधिकारी शामिल थे।
पुंछ के डिवीजनल कमिश्नर वहीद खान ने सरकारी कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने रॉयटर्स से कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा काफिले का रास्ता रोका और अधिकारियों पर हमला किया। उनके अनुसार, पुलिस और सुरक्षा बलों ने आत्मरक्षा में जवाब दिया।
नई दिल्ली ने इस अशांति के लिए पाकिस्तान की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि यह संकट क्षेत्र के “दशकों पुराने व्यवस्थित शोषण” का सीधा परिणाम है।
यह संघर्ष भारत और पाकिस्तान के पुराने विवाद को फिर तेज कर रहा है। दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश 1947 से पूरे कश्मीर पर अपना दावा करते आए हैं। पहाड़ी क्षेत्र अब भी राजनीतिक अविश्वास और सैन्य तनाव के बीच बंटा हुआ है।
वोल्कर तुर्क ने सभी पक्षों से तुरंत संयम बरतने को कहा है। उन्होंने सुरक्षा बलों पर निर्भर नीति के बजाय व्यापक राजनीतिक बातचीत की मांग की।
हमारे सामने असंतोष की जड़ें साफ हैं। क्षेत्रीय स्वायत्तता को लेकर बेचैनी है। महंगाई ने परिवारों की कमर तोड़ी है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भरोसा कमजोर पड़ा है।
इन सवालों का जवाब बंदूक, प्रतिबंध या इंटरनेट बंद करके नहीं मिलेगा। तुर्क ने ऐसा संवाद शुरू करने की अपील की है, जिसमें स्थानीय समुदायों और अलग-अलग राजनीतिक समूहों को वास्तविक जगह मिले।
