केंद्र सरकार ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर पूर्ण प्रतिबंध का मसौदा जारी किया है। यह तेज असर वाला कृषि रसायन बेहद विषैला माना जाता है। इसके जहर का कोई प्रमाणित इलाज मौजूद नहीं है।
नई दिल्ली: भारत ने खेतों में इस्तेमाल होने वाले सबसे खतरनाक खरपतवारनाशकों में शामिल पैराक्वाट डाइक्लोराइड के खिलाफ निर्णायक कदम उठाया है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 13 जुलाई 2026 को बैनिंग ऑफ पैराक्वाट डाइक्लोराइड ऑर्डर, 2026 का मसौदा राजपत्र में प्रकाशित किया। इसमें पैराक्वाट के निर्माण, आयात, बिक्री, परिवहन, वितरण और इस्तेमाल पर देशव्यापी रोक लगाने का प्रस्ताव है।
यह प्रतिबंध अभी अंतिम नहीं है। सरकार ने किसानों, कृषि विशेषज्ञों, कंपनियों और अन्य पक्षों को अपनी आपत्तियां या सुझाव देने के लिए 30 दिन का समय दिया है। राय पर विचार करने के बाद अंतिम आदेश जारी होगा।
खरपतवार मरते हैं, इंसान भी बच नहीं पाता
पैराक्वाट एक तेज और गैर-चयनात्मक खरपतवारनाशक है। यह हरी वनस्पति को तेजी से झुलसा देता है। कम कीमत और तीखे असर के कारण भारतीय खेतों में इसका व्यापक इस्तेमाल होता रहा।
इसकी यही ताकत इसका भयावह चेहरा भी है।
पैराक्वाट शरीर में पहुंच जाए तो फेफड़ों को गहरी चोट लग सकती है। ऊतक कठोर होने लगते हैं। सांस लेना मुश्किल हो जाता है। गुर्दे और जिगर भी खराब हो सकते हैं।
इस जहर का कोई प्रमाणित प्रतिविष या निश्चित इलाज नहीं है। डॉक्टर केवल शरीर के जरूरी अंगों को सहारा देने वाला उपचार कर पाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज को बचाना बेहद कठिन हो जाता है।
खतरा केवल इसे निगलने से नहीं है। छिड़काव की महीन बूंदें सांस के साथ शरीर में जा सकती हैं। घायल त्वचा पर रसायन लगना भी जोखिम बढ़ाता है। खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर इसकी सीधी मार झेलते हैं।
70 से अधिक देशों ने पहले ही दिखाई सख्ती
यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और चीन सहित 70 से अधिक देशों ने पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाया है या इसके इस्तेमाल को बेहद सीमित कर दिया है।
भारत में यह रसायन वर्षों तक वैध बना रहा। कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर अस्थायी रोक लगाई। तेलंगाना सरकार ने अप्रैल 2026 में इसकी बिक्री और इस्तेमाल पर 60 दिन का प्रतिबंध लगाया था। स्थायी देशव्यापी रोक लगाने का अधिकार केंद्र के पास है।
हम इसे देर से लिया गया, मगर जरूरी फैसला मानते हैं। खेत की लागत घटाने वाला कोई रसायन किसान की सांस, त्वचा और जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकता।
सरकारी जांच में सामने आया गलत इस्तेमाल
केंद्र सरकार ने 14 जनवरी 2026 को विशेषज्ञ समिति बनाई थी। समिति ने पैराक्वाट के पंजीकरण, उपयोग और स्वास्थ्य प्रभावों की समीक्षा की। उसने 12 जून को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
इसके बाद कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत बनी पंजीकरण समिति ने वैज्ञानिक अध्ययनों और सुरक्षा आंकड़ों को परखा। समिति ने पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश की।
जांच में रसायन के गलत इस्तेमाल का गंभीर पहलू भी सामने आया।
पैराक्वाट को खरपतवार नियंत्रण के लिए पंजीकृत किया गया था। कुछ इलाकों में किसान इसे मूंग और सोयाबीन जैसी खड़ी फसलों को जल्दी सुखाने के लिए छिड़क रहे थे। इससे कटाई तेज हो जाती थी और मजदूरी का खर्च घटता था।
यह इस्तेमाल स्वीकृत नहीं था। कटाई से ठीक पहले किया गया ऐसा छिड़काव खाद्य सुरक्षा पर भी तीखे सवाल खड़े करता है।
अंतिम आदेश के बाद क्या बदलेगा
प्रतिबंध लागू होते ही पैराक्वाट का आयात, निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री और इस्तेमाल गैरकानूनी हो जाएगा।
इसके सभी पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द माने जाएंगे। कंपनियों और पंजीकरण धारकों को तीन महीने के भीतर प्रमाणपत्र जमा करने होंगे। राज्य सरकारें दुकानों, गोदामों और वितरण तंत्र की जांच कर सकेंगी। उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई होगी।
सिर्फ आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा।
किसानों को सुरक्षित विकल्प चाहिए। उन्हें यांत्रिक निराई, कम विषैले रसायनों और टिकाऊ खरपतवार प्रबंधन का प्रशिक्षण देना होगा। छोटे किसानों के लिए उपकरण सुलभ बनाने होंगे। बाजार में नकली या चोरी-छिपे बेचे जाने वाले उत्पादों पर भी पैनी निगरानी चाहिए।
एक रसायन से बड़ा है यह फैसला
हम इस प्रस्ताव को भारतीय कृषि नीति में बदलती सोच का संकेत मानते हैं।
कई पुराने कृषि रसायनों को उस दौर में मंजूरी मिली थी, जब स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े आंकड़े सीमित थे। अब नए वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। खेतों में गलत इस्तेमाल के तरीके भी सामने आ चुके हैं।
पैराक्वाट पर रोक केवल एक जहरीली बोतल को दुकान से हटाने का मामला नहीं है। यह सवाल किसान की सुरक्षा का है। खेत की मिट्टी का है। भोजन की शुद्धता का है।
सरकार ने पहला कठोर कदम उठा दिया है। अब असली परीक्षा उसके ईमानदार क्रियान्वयन की होगी।
