नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारतीय रुपये को फिर झटका दिया है।
बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 0.3 प्रतिशत गिरकर 96.5650 पर बंद हुआ। यह दो महीने का सबसे कमजोर स्तर है। मुद्रा अब मई में दर्ज 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच रही है।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह महंगा कच्चा तेल है।
अमेरिका और ईरान के बीच तेज होते संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर डर बढ़ा दिया है। ब्रेंट कच्चा तेल 95 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। जुलाई में तेल की कीमतें 25 प्रतिशत से अधिक चढ़ चुकी हैं।
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। महंगा तेल देश का आयात बिल बढ़ाता है। इससे मुद्रास्फीति तेज हो सकती है और चालू खाते का घाटा चौड़ा हो सकता है।
लाल सागर का संकट भी बाजार को डरा रहा है।
यमन के ईरान समर्थित हूती समूह ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की धमकी दी है। जहाजों को लंबा रास्ता चुनना पड़ा तो ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा। एशिया पहुंचने वाले तेल की कीमत पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
रुपये की गिरावट कुछ हद तक थमी भी।
कारोबारियों के मुताबिक, सरकारी बैंकों ने 96.50 से 96.55 के आसपास डॉलर बेचे। बाजार का अनुमान है कि यह कदम भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से उठाया गया।
जून में घोषित RBI के उपायों से 17 जुलाई तक 20 अरब डॉलर से अधिक की रकम आई। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस धन के एक हिस्से ने केंद्रीय बैंक की बड़ी फॉरवर्ड डॉलर देनदारियों को घटाने में मदद की।
भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में रहा। प्रमुख सूचकांक करीब एक प्रतिशत गिरे। दस वर्ष वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड ऊपर चली गई।
हमारी नजर में रुपये की अगली चाल अब केवल RBI पर निर्भर नहीं है।
तंगहाली का असली केंद्र समुद्री रास्ते हैं। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर में आवाजाही और बाधित हुई, तो तेल महंगा रहेगा। ऐसे में रुपये पर दबाव और गहरा सकता है।
