ब्लॉग: गोरखपुर में बीजेपी की हार की वजह बबूआ और बुआजी नहीं कुछ और है

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश कुमार बताते हैं कि गोरखपुर में बीजेपी की हार बबूआ और बुआजी की जीत नहीं बल्कि जातीय अहंकार की हार है…

नई दिल्ली: गोरखपुर उपचुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक हार बबूआ और बुआजी के गठजोड़ की विजय नहीं बल्कि तीन जातियों ब्राह्मण, ठाकुर और निषाद के झूठे जातीय अहंकार की हार है। क्योंकि जब से योगी आदित्यनाथ सीएम बने, तब से दुष्प्रचार किया जाने लगा कि वो ब्राह्मण विरोधी हैं। जिसका अभास शायद योगी को भी रहा हो, इसलिए उन्होंने निकाय चुनाव में भी पार्षद का टिकट ब्राह्मण उम्मीदवार को दिया था। जिसे अल्पसंख्यक समुदाय के एक प्रत्याशी ने हराया था। आदित्यनाथ ने फिर वही गलती दोहराई और लोकसभा उपचुनाव में एक ब्राह्मण को उम्मीदवार बनाया। नतीजा बीजेपी की ऐतिहासिक हार हुई।

क्योंकि बाहुबली हरिशंकर तिवारी को बहुत बड़ा समाज सेवी मानने वाले ब्राह्मणों का एक बड़ा तबका ठाकुर योगी को उनके गढ में शिकस्त देना चाहता था। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ वोट डाला। ब्राह्मण को टिकट देने से नाराज ठाकुरों में से कुछ ने योगी के खिलाफ वोटिंग की, तो कुछ घर से वोटिंग के लिए नहीं निकले। निषाद जाति के लोग गोरखनाथ पीठ के कई दशकों से समर्थक हैं। उन्होंने हमेशा मठ के प्रति आस्था दिखाई, उन्हें उम्मीद थी कि योगी, मठ से जुड़े किसी ताकतवर शख्स या उनके समुदाय से किसी को उम्मीदवार बनाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वो नाराज हो गए, और महंत योगी आदित्यनाथ को सबक सिखाने के लिए योगी के खिलाफ वोटिंग की। पूर्वी उत्तर प्रदेश में निषाद जाति के लोगों का अच्छा प्रभाव है। जिसका फायदा समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को हुआ। नतीजा बीजेपी की हार के रूप में सामने आई। एसपी और बीएसपी के गठबंधन को अगर सही मायने में जनता ने पसंद किया होता, तो रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई होती, और जीत हार का फासला लाखों में होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

ये जीत समाजवादी पार्टी के लिए पानी के बुलबुले की तरह है। इससे अखिलेश यादव को 10 महीने तक राहत मिलेगी। पार्टी में उनके नेतृत्व पर अब कोई सवाल नहीं खड़ा करेगा और परिवार में भी उनके नेतृत्व को अब कोई चुनौती नहीं देने की साहस करेगा। मोदी-योगी विरोधियों को इसमें 2019 आम चुनाव में बीजेपी की हार की झलक नजर आएगी, और वो आम चुनाव तक खुद और अपने आस-पास के लोगों को मोदी की हार का सब्जबाग दिखाते रहेंगे।

राजनीतिक पंडित टीवी चैनलों पर आस्था के मुताबिक प्रवचन देते रहेंगे। नेताओं और समीक्षकों को भले ही जमीनी हकीकत का एहसास नहीं हो, लेकिन बंद कमरों में एसी का मजा लेते हुए, जनता का मूड का अंदाजा लगाते नजर आएंगे। लेकिन अभी भी मेरी व्यक्तिगत राय है कि मोदी को 2019 में पराजित करना नामुमकिन ही नहीं असंभव है। कम से कम राहुल गांधी के नेतृत्व वाली सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लिये संभव तो नहीं दिख रहा है।

ये लेख वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश कुमार की ब्लॉग से लिया गया है। इसमें सम्मिलित विचार लेखक के निजी विचार हैं। 

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