नॉर्थ कोरिया के Hydrogen Bomb परीक्षण से शक्ति संतुलन बिगड़ेगा ?

नॉर्थ कोरिया के Hydrogen Bomb परीक्षण से शक्ति संतुलन बिगड़ेगा ?

परीक्षण का अमेरिका, यूके, फ्रांस, जापान पर क्या असर पड़ेगा ?

इस परीक्षण के बाद क्या किम जोंग की तानाशाही और बढ़ेगी ?

बुधवार को उत्तरी कोरिया में 5.1 तीव्रता वाले भूकंप के झटके को महसूस किया गया। लेकिन भूकंप के इस झटके पर प्रतिक्रिया अमेरिका, यूके, फ्रांस, रूस, जापान जैसे देशों से आई। इसकी खास वजह थी। क्योंकि बुधवार का भूकंप कोई प्राकृतिक या भूगर्भिक हलचल की वजह से नहीं आय़ा था। इसके पीछे वजह था ईस्ट एशिया में उत्तरी कोरिया की तरफ से खुद को शक्तिशाली बनाने की जिद। दरअसल उत्तरी कोरिया की तरफ से दावा किया गया की उसने पहले Hydrogen Bomb का सफल परीक्षण किया है। जिसका मतलब ये था कि 2006, 2009 और 2013 में किये गए तीन परमाणु परीक्षण की वजह से जिस उत्तरी कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से प्रतिबंध लगाए गए थे वो बेअसर हो गया। क्योंकि इसबार उत्तरी कोरिया नेHydrogen Bomb का परीक्षण किया है जो कि परमाणु Bomb के मुकाबले कई  गुना ज्यादा खतरनाक है। यही वजह है कि अमेरिका, फ्रांस, यूके, जापान, रुस जैसे देश भी सख्त लहजे में अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

एक तानाशाह के अधीन है उत्तरी कोरिया

उत्तरी कोरिया में कोई लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार नहीं है। वहां किम जोंग उन की तानाशाही चलती है। जो अपनी क्रूरता के लिए जाना जाता है। एक ऐसे तानाशाह के हाथ में अगर Hydrogen Bomb जैसी शक्ति आ जाती है तो एक चिंता का विषय है। इसलिए जैसे ही Hydrogen Bomb के परीक्षण की बात सामने आई जापान में इमरजेंसी बैठक बुलाई गई, अमेरिका के व्हाइट हाउस की तरफ से बयान जारी किया गया जिसमें कहा गया कि उत्तरी कोरिया को इसका सही तरके से जवाब दिया जाएगा। रुस, फ्रांस, यूके पहले ही परेशान हैं। क्योंकि इन सभी देशों की तरफ से उत्तरी कोरिया को परमाणु कार्यक्रम बंद करने के लिए कई बार चेतावनी दी जा चुकी है। सबसे बड़ी चिंता ये है कि एक परमाणु शक्ति संपन्न देश पर ईराक या लीबिया की तरह कार्रवाई नहीं की जा सकती। क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये है कि जिस उत्तरी कोरिया को मनमानी करने से अबतक शक्तिशाली देश रोकने की कोशिश कर रहे थे क्या इस परीक्षण के बाद उन देशों का उत्तरी कोरिया पर प्रभाव कम या खत्म हो जाएगा। और किम जोंग अपने मुताबिक अपने फैसले लेता रहेगा।

उत्तरी और दक्षिणी कोरिया में और बढ़ेगा तनाव

40 के दशक में जब उत्तरी और दक्षिणी कोरिया अलग हुए थे तब दोनों के बीच करार हुआ था कि बगैर एक दूसरे के सहमति के कोई भी परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन अब संधी की वो बातें बे मतलब की हो चुकी हैं। परमाणु शस्त्र की होड़ बढ़ने से रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से जो मेमोरेंडम तैयार किया गया है उसका भी यहां उल्लंघन हुआ है। ये एक चिंता की बात है। जाहिर है तमाम दबाव और निर्देशों को दरकिनार करने के बाद जिस तरह से उत्तर कोरिया के तानाशाही शासक ने अपनी परमाणु शक्ति को बढाने की कोशिश की है उसके बाद उसपर अमेरिका, फ्रांस, रूस जैसे देशों की तरफ से नए सिरे से दबाव बनाने की कोशिश की जाएगी। उसके जवाब में उत्तर कोरिया की तरफ से भी प्रतिक्रिया दी जाएगी। डर इस बात का है कि कहीं इस दबाव और जवाब के चलते शक्ति संतुलन न बिगड़ जाए। अगर ऐसा होता है तो इसका असर केवल ईस्ट एशिया तक नहीं रहेगा बल्की अमेरिका और यूरोप के देश तक इससे प्रभावित होंगे।

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