आखिर निशिकांत दुबे क्यों तीन बार गोड्डा लोकसभा से सांसद बने, एक बड़ी वजह ये भी है

गोड्डा/झारखंड:  राजनीति में अगर आपने किसी चुनाव में जीत दर्ज की और अगर वो जीत आपने पहली बार हासिल की है तो इसमें कोई हैरान होने वाली या कोई बड़ी बात नहीं है। ये बात अजीब लग सकती है, क्योंकि कहा जाता है पहली बार कहीं पर खुद के लिए जगह बनाना सबसे मुश्किल दौर होता है। एक हद तक ये बात सही भी है। लेकिन अगर इसे दूसरे नजरिये से देखें तो पहली बार आपकी जीत एक प्रयोग भर होती है। जिसमें जनता का साथ आपको मिलना एक प्रतिक्रिया भर हो सकता है। जिसमें जनता ने परिवर्तन का मन बनाया हो और उसी के फलस्वरूप विजयश्री आपके नाम कर दी हो। लेकिन अगर जीत तीसरी बार मिले और पहले दो जीत के मुकाबले बड़ी भी हो तो ये सवाल उठता है कि वो क्या वजह रही होगी जिसने किसी एक शख्सियत को लगातार तीसरी बात विजय मंच पर सुशोभित किया। इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे लेकिन पहले एक खबर पढ़ लीजिये, दरअसल जो आगे कहने जा रहा हूं उसके केंद्र में ये खबर भी अपनी जगह रखता है।

लॉकडाउन की वजह से सभी लोग अपने घरों में कैद हैं। ये जरुरी भी है। हालात कितने नाजुक हैं इसका अंदाजा इस बात से भी आप लगा सकते हैं कि लोग बेहद जरुरी परिस्थिति में भी अपने जिले की सीमा को पार नहीं कर पा रहे हैं। वजह है कोरोना वायरस का संक्रमण। इसलिए पूरी सख्ती के साथ हर राज्य और हर जिले की सीमा को सील कर दिया गया है।

ऐसे में अगर किसी को बेहद जरुरी दवाई की जरुरत हो और वो दवाई स्थानीय बाजार में नहीं मिल रही हो, बाहर से लाने का कोई साधन आपके पास नहीं हो और अगर कोई आप तक वो दवाई पहुंचा दे तो ऐसा करनेवाला इंसान तो आपके लिए फरिश्ता ही होगा न। ऐसा ही कुछ हुआ गोड्डा में हटिया चौक के पास रहनेवाली रेखा देवी के साथ।

रेखा देवी किडनी की मरीज हैं। उनका इलाज रांची में चल रहा है और दवाई की उन्हें सख्त जरुरत थी। स्थानीय बाजार में वो दवाई उपलब्ध थी नहीं। ऐसे में उनकी इस जरुरत की जानकारी सांसद निशिकांत दुबे तक पहुंचती है। कोरोना योद्धा के तौर पर काम रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं ने रेखा देवी को वो दवाई उनके घर तक पहुंचा कर दी। इसमें हरी सिंह, शिवेश वर्मा, उज्जवल सिंह, नंदन सिंह और गौरव कुमार शामिल थे। ये एक खबर है… अब आगे की बात करते हैं

ये पहला मौका नहीं है जब सांसद निशिकांत दुबे की तरफ से ऐसा किया गया हो। इससे पहले भी गोड्डा लोकसभा में अलग जिले और पंचायत तक जरुरतमंदों तक जिंदगी बचाने के लिए बेहद दवाई उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के जरिये पहुंचाया है। इसमें पोड़ैयाहाट भी शामिल है, देवघर भी शामिल है, सारठ-सारवां के आसपास के इलाके भी शामिल हैं। ये वो कुछ उदाहरण हैं जो लॉकडाउन और कोरोना संक्रमण काल के दौरान के हैं।

अब अपने मूल विषय की तरफ लौटते हैं आखिर तीन बार केवल निशिकांत दुबे ही क्यों? दरअसल एक सांसद के तौर पर उनके पिछले दो कार्यकाल और मौजूदा एक साल के कार्यकाल में उनके लोकसभा क्षेत्र में कई ऐसे काम (देवघर एयरपोर्ट, अडाणी पावर प्लांट, देवघर एम्स, पुनासी डैम, कृषि विश्वविद्यालय इत्यादि इत्यादि) किये गए हैं जो अपने आप में विकास की कहानी बयां करती हैं।

ये वो काम हैं जिन्हें पूरा करने का काम किया जा रहा है। लेकिन इससे इतर भी एक भूमिका है जो जनता के मन को भा गई है वो है उनका क्षेत्र की जनता के प्रति समर्पण। उनका यही समर्पण दिल्ली, तमिलनाडु, तेलंगाना, मुंबई, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में फंसे उन मजदूरों तक उन्हें पहुंचाया है जो इस लॉकडाउन के समय में फंस गए हैं। उनके कामकाज बंद हो चुके हैं, आय का जरिया बंद हो चुका है, घर वापसी पर एक अनिश्चित प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है।

जहां इतना अभाव होगा वहां पर सबसे बड़ी परेशानी राशन जुटाने की होती है। ये परेशानी उन मजदूरों को भी हुई जो लॉक डाउन की वजह से अभाव में जीने को मजबूर हो चुके थे। उनके घर से किसी की दूरी हजार किलोमीटर है किसी की 1500 किलोमीटर। घर से कोई मदद पहुंच नहीं सकती है लिहाजा सांसद की तरफ से येन केन प्रकारेण उनतक मदद पहुंचाई जा रही है ताकि उन्हें दो वक्त की रोटी मिलती रहे और उन्हें भूखा न सोना पड़े।

एक सांसद ऐसे विषम परिस्थिति में हाथ खड़े भी कर सकता था या ये जवाब भी दे सकता था कि हम कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां पर कोशिश कर रहे हैं वाला जवाब के बजाय हमने कोशिश की, हमने मदद पहुंचाई वाली बात हुई। यही एक सांसद को भीड़ से अलग खड़ा करता है और जनता के प्रति यही समर्पण एक व्यक्ति को व्यक्तित्व प्रदान करता है।

अगर निशिकांत दुबे ने लोकसभा चुनाव में तीन बार जीत दर्ज की तो उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है उनका व्यक्ति होना नहीं बल्कि उनका व्यक्तित्व है। लोगों ने उनके व्यक्तित्व को अपने मन में बसाया और जब व्यक्तित्व का जब जादू चलता है तो चमत्कार भी होता है। जहां ये सबकुछ एक साथ हो तो वहां पर आरोप भी विजय के मार्ग में बाधक नहीं बनती।

ये सत्य है कोई इंसान खुद में पूर्ण नहीं होता है। कमियां सभी में होती हैं। प्रकृति के इस सत्य से निशिकांत दुबे भी अछूते नहीं है। अकसर ये कहा सुना जाता है कि जो निशिकांत दुबे जनता के लिए अपना समर्पण जाहिर करते हैं वो कार्यकर्ताओं को केवल सांत्वना देते हैं। लेकिन इसके बावजुद उस किरदार का समर्थन भी किया जाता है। ये बताता है कि आपसे वैचारिक नाराजगी हो सकती है लेकिन उस नाराजगी में समर्थन का समर्पण भी है। और यही समर्पण जीत की बुनियाद तैयार करती है। जिसपर मंजिल दर मंजिल उपलब्धियों की इमारत खड़ी हो रही है।

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