BJP को राम नाम से परहेज क्यों होने लगा है ?

BJP को राम नाम से परहेज क्यों होने लगा है ?

नई दिल्ली: यूपी बीजेपी के नए नवेले प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने जो बात कही उसपर यकीन कर पाना जरा मुश्किल है। लेकिन जिस तरह से उन्होंने ये बात कही उसने कई संभावनाओं और आशंकाओं को भी जन्म दे दिया है। पहले ये जान लीजिये की यूपी में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने राम मंदिर को लेकर क्या कहा है। उन्होंने कहा है कि राम मंदिर कभी बीजेपी के एजेंडे में शामिल रहा ही नहीं। और यूपी में पार्टी विकास के मुद्दे पर चुनाव लडेगी ना की राम मंदिर के नाम पर। अपने बयान में उन्होंने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का नाम भी लिया । मौर्य ने कहा कि अगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को ये लगता है कि राम मंदिर उन्हें जीत दिला सकता है तो वो इस मुद्दे पर चुनाव लड़ लें।

मौर्य ने ये बयान उस वक्त दिया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है। बीजेपी ने इस बार राज्य में अपनी खोई जमीन हासिल करने के लिए अलग रणनीति बना रखी है। यूपी का चुनाव इसलिए भी पार्टी के लिए खास है क्योंकि इसी यूपी से बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में 80 में से 72 सीट जीत ली थी। जिसे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का करिश्माई नेतृत्व माना जा रहा था। ये सही है कि लोकसभा चुनाव बीजेपी ने विकास के मुद्दे पर लड़ा। उसकी फायदा भी मिला बीजेपी को। शायद यही वजह है कि बीजेपी को अब ये एहसास हो रहा है कि राम मंदिर से ज्यादा फायदेमंद विकास का मुद्दा है। लेकिन ये भी एक सत्य है कि 1991 में राम मंदिर के बल पर ही राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी थी। राज्य में बीजेपी की सरकार आकर चली गई लेकिन मंदिर नहीं बना। ये भी एक वजह हो सकती है कि बीजेपी राम मंदिर से प्रत्यक्ष तौर पर नहीं जुड़ना चाहती हो। लेकिन एक सत्य ये भी है कि बीजेपी भले ही राम मंदिर से खुद को अलग दिखाने की कोशिश कर रही हो लेकिन राम मंदिर का विषय शरीर के किसी खास अंग की तरह जुड़ा है। जिसे अलग नहीं किया जा सकता है।

राजनीतिक नजरिये से सबसे अहम राज्य यूपी की कमान मिलने के बाद मौर्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जिम्मेदारी पर खरा उतरने की है। केंद्र सरकार के किये काम पर यूपी में वोट मिलने से रहे। राम मंदिर से वो खुद किनारा कर चुके हैं। ऐसे में केवल विरोध ही एक रास्ता बनता है। मुलायम, अखिलेश और मायावती का विरोध। लेकिन इन हेवीवेट नेताओं के सामने मौर्य का वजन काफी हल्का है। दलित वोटबैंट को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी ने मौर्य को अध्यक्ष तो बना दिया। लेकिन ये काम इतना आसान भी नहीं होगा।

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