इन देशों में भी हो चुकी है नोटबंदी जानिये फिर क्या हुआ?




नई दिल्ली: 8 नवंबर को रात के 8 बजे मोदी सरकार ने 500 और 1000 के नोट बंद करने का जो फैसला सुनाया वो अपने आप में अकेला फैसला नहीं है। इससे पहले भी दुनिया के दूसरे देशों में इसी तरह से नोटबंदी का ऐलान किया गया था। विकसित देशों की सरकार ने जब डिमॉनेटाइजेशन प्रक्रिया शुरु की तो हड़बड़ी हर तरफ मची। विकसित देशों में जब इस तरह के नियम लागू किये गए तो उन्हें सुधार कार्यक्रम लागू करने में भी सफलता मिली।

इंग्लैंड में 1971 में करेंसी में बदलाव के लिए रोमन काल से चले आ रहे सिक्कों को हटाने के लिए पाउंड में दशमलव पद्धति लागू किया गया था। बैंकिग और करेंसी की टर्म में इस प्रिक्रिया को डेसिमलाइजेशन कहा जाता है। इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए वहां बैंकों को 4 दिन का वक्त दिया गया था।ताकि नई करेंसी देशभर में पहुंचाई जा सके। इस दौरान देश के सभी बैंक बंद रहे। इस बारे में कहा जाता है कि इससे इंग्लैंड को किसी बड़े नुकसान का सामना नहीं करना पड़ा और पुराने सिक्के अर्थव्यवस्था से बाहर हो गए।

इसके बाद यूरोप में 2002 में करेंसी को लेकर बड़ा फैसला लिया गया। जब यूरोपीय यूनियन के 11 देशों ने नई यूरो करेंसी लागू की। 12वें देश ग्रीस ने बाद में लागू किया। 1999 में यूरो तैयार हो चुका था और तीन साल तक सभी देश इसे लीगल टेंडर घोषित करने की तैयारी कर रहे थे। लंबी तैयारी और सोची समझी रणनीति का नतीजा ये हुआ कि यूरोप के 12 देशों में नई करेंसी को सफलता के साथ लॉन्च किया जा सका।




लेकिन सोवियत संघ के साथ ऐसी बात नहीं थी। जनवरी 1991 में सोवियत यूनियन के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव ने डिमॉनेटाइजेशन की शुरुआत की। मकसद अर्थव्यवस्था में ब्लैक मनी बन चुके रुबल को बाहर करना था। लिहाजा वहां 50 और 100 रुबल की करेंसी को प्रतिबंधित कर दिया गया। यह करेंसी उनकी अर्थव्यवस्था का एक तिहाई था। लेकिन करेंसी सुधार के दौरान सोवियत यूनियन महंगाई पर लगाम नहीं लगा सका। नतीजा ये हुआ कि अगस्त आते आते सोवियत यूनियन विघटन का शिकार हो गई।

2010 में उत्तर कोरिया ने डिमॉनेटाइजेशन कार्यक्रम चलाया। तानाशाह किम जॉन्ग द्वितीय ने कालाबाजारी पर लगाम लगाने और अर्थव्यवस्था को काबू में करने के लिए देश की सभी करेंसी की वैल्यू से दो शून्य हटा दिये। इसके बाद 1000 रुपये केवल 10 रुपये रह गए और 5000 की नोट 50 रुपये की कीमत पर पहुंच गए। फसल पहले ही खराब हो चुकी थी। नतीजा ये हुआ कि देश में गंभीर खाद्य संकट पैदा हो गया। चावल की कीमत आसमान पर पहुंच गई। हालात जब बेकाबू हो गए तो तानाशाह ने अपनी गलती के लिए माफी मांगी।

म्यांमार ने भी 1987 में एक ही फैसले में देश की 80 फीसदी करेंसी को गैरकानूनी घोषित कर दिया। वहां की सरकार ने भी ये कदम ब्लैकमनी और ब्लैकमार्केटिंग पर लगाम लगाने के लिए उठाया था। नतीजा ये हुआ कि मिलिट्री शासन में पहली बार छात्रों ने जनता शासक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरु कर दिया। विरोध लंबा चला और सरकार ने उतनी ही बर्बरता से इसका दमन किया।

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