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टमाटर पर छाई महंगाई, सब्जी बेरंग हो गई

टमाटर पर छाई महंगाई, सब्जी बेरंग हो गई

स्कूल में नर्सरी के बच्चे को क्लास में रट्टा लगाते हुए सुना… वो कह रहे थे…आहा टमाटर बड़ा मजेदार… बच्चों को टमाटर का नाम इस आदर से लेते हुए सुना तो हरी सब्जी के बीज में अपने लाल रंग पर इठलाने वाले इस टमाटर के प्रति मेरे मन में भी सम्मान जाग उठा। वो सम्मान इस कदर मेरी जुबान पर हावी हुआ की मैं मंडी पहुंच गया। ये सोचकर की आज टमाटर भईया को अपने दस्तरखान में जगह देकर ही रहूंगा। मेरी सोच में कोई खोट नहीं थी लेकिन जब मंडी में टमाटर भईया के भाव सुने तो सम्मान देने की सारी लालसा ऐसे गायब हो गई जैसे चुनाव जीतने के बाद नेता अपने चुनाव क्षेत्र से गायब होते हैं।

मंडी में टमाटर का भाव मैने पूछा था लेकिन कलेजा चौड़ा हो गया दुकानदार का। दिलकश चेहरे की त्योरियां चढ़ाते हुए विनम्रता मिश्रित गर्व के साथ उसने कहा 80 रुपये किलो। दहाई अंक के इस भाव को सुनने के बाद तो मानो मुझे ये एहसास होने लगा की मैं भारतीय सब्जी मंडी की जगह कहीं स्पेन, दुबई या मलेशिया के सब्जी बाजार में तो नहीं पहुंच गया।

बात चाहे गुलाबी शहर जयपुर में बिकने वाले लाल टमाटर का कर लें… नवाबों के शहर लखनऊ में बिकने वाले टमाटर की कर लें…निजामों के शहर हैदराबाद में बिकनेवाले टमाटर की कर लें… अम्मा के सूबे तमिलनाडु में बिकने वाले टमाटर की बात कर लें…या दीदी के सूबे की, टमाटर का भाव हर जगह बिगड़ा हुआ है। कितने नाम गिनवाएं कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रेदश, झारखंड बिहार या फिर सल्तनत के सबसे बड़े सरदार के शहर दिल्ली की बात कर लें। इन जगहों में केवल शहरों के नाम ही बदले हैं टमाटर का भाव थोड़े बहुत उतार चढ़ाव के साथ 80 से 100 रुपये प्रति किलो के बीच चिपक गया है।

एक तो प्रकृति ने टमाटर को पहले से लाल बनाया है उसपर जब महंगे भाव का रंग चढ़ा तो इसके लाल रंग को देखकर लोगों की आंखें चुंधियाने लगीं। केवल जनता ही परेशान नहीं हुई है टमाटर के इस भाव से। मोदी सरकार के खजांची अरुण जेटली तक को परेशान कर दिया टमाटर और सब्जियों के मंहगे भाव ने। दिल्ली में महंगाई पर बैठक बुलाई गई। राम बिलास पासवान, राधा मोहन सिंह, नितिन गड़करी और अरुण जेटली मिल बैठकर उस नुस्खे की तलाश कर रहे हैं जिससे की टमाटर की इस चुंधिया देनेवाली चमक को फीका किया जा सके। सरकार इसलिए भी चिंतित है क्योंकि अबतक सरकारी आंकड़ों में महंगाई कम होती थी और जमीन पर यानि मंडी में महंगाई बरकरार रहती थी। लेकिन इसबार आंकड़ों ने भी महंगाई के लकीर को छू लिया और मंडी में तो पहले से ही महंगाई थी। अगर सब्जियों की महंगाई दर की बात करें तो अप्रैल महीने में सब्जियों की महंगाई दर जहां ढाई फीसदी के करीब थी वहीं मई महीने में सब्जियों की महंगाई दर तकरीबन साढ़े बारह फीसदी के करीब पहुंच गई। इसके बाद चिंता बढ़ना तो वाजिब था। इसलिए महंगाई पर केंद्रीय वित्त मंत्री की अगुवाई में बैठक में महंगाई के आंकड़ों को कम करने के रास्ते ढूंढे गए।

सरकार तो अपना रास्ता ढूंढ रही है महंगाई को काबू करने के लिए। लेकिन आम जनता जिस रास्ते पर चलकर मंडी तक पहुंचती थी अब उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं हो रही है। क्योंकि वो रास्ता काफी महंगा हो गया है। और अगर मंडी पहुंच भी गए तो लोग टमाटर से ऐसे नजरें चुराते हैं जैसे नई नवेली दुल्हन ससुराल में अपने जेठ से नजरें मिलाने से बचती हैं। वाह रे महंगाई कभी प्याज ने अपना असर दिखाया था आज टमाटर की बारी है, जिसके महंगे चटक लाल रंग को देखकर लोगों की आंखें चुंधिया रही हैं।

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