अलगाववादी नेताओं को लेकर मोदी सराकर का यू टर्न

अलगाववादी नेताओं को लेकर मोदी सराकर का यू टर्न

  • पाकिस्तान से बातचीत और मुलाकात पर एतराज नहीं
  • अलगाववादियों की वजह से ही रद्द हुई थी वार्ता

कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के रुख पर सख्त तेवर अपनानेवाली मोदी सरकार ने अपने तेवर में बदलाव कर लिये हैं। एक तरह से कहा जाए तो मोदी सरकार ने अलगाववादी संगठनों पर अपने मौजूदा रुख से यू टर्न कर लिया है। पहले जहां पाकिस्तान के साथ अलगाववादी संगठनों की बातचीत सरकार को मंजूर नहीं थी वहीं अब इस तरह की कोई बात नहीं रही है। एक तरह से पाकिस्तानी नेताओं और अलगाववादी संगठनों के नेताओं के बीच बातचीत को मोदी सरकार ने हरी झंडी दे दी है।

संसद नें दिये गए एक लिखित जवाब में विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने कहा ‘जम्मू –कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और कश्मीर के अलगाववादी नेता भी भारतीय नागरिक हैं। इस वजह से वे किसी भी देश के प्रतिनिधि से मुलाकात और बात कर सकते हैं। जवाब में वीके सिंह ने ये भी साफ किया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच किसी तीसरे पक्ष को नहीं लाया जाएगा। उन्होंने कहा ‘भारत अबतक इस बात पर अडिग रहा है कि पाकिस्तान से बातचीत में किसी तीसरे पक्ष का रोल नहीं होगा। जैसा कि शिमला समझौते और लाहौर घोषणा पत्र में भी कहा गया है।‘

दरअसल अगस्त 2014 में मोदी सरकार ने विदेश सचिव स्तर की बातचीत से पहले अलगाववादी नेताओं से मिलने की पाकिस्तान की मांग को ठुकरा दिया था। जिसका नतीजा ये हुआ की बातचीत ही रद्द हो गई। अगस्त 2015 में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भारत आना था। लेकिन उससे पहले दिल्ली में मौजूद पाकिस्तानी हाई कमीशन ने अलगाववादी नेताओं से बातचीत की। जिसके बाद भारत की तरफ से बातचीत रद्द कर दी गई। तब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि पाकिस्तान को भारत या अलगाववादी में से किसी एक को चुनना होगा।

अब सवाल ये उठता है कि जब मोदी सरकार कश्मीर के अलगाववादी संगठनों की वजह से दो-दो बार पाकिस्तान के साथ बातचीत रद्द कर चुकी है। तो फिर अचानक अलगाववादी संगठनों और पाकिस्तान के बीच बातचीत को हरी झंडी दिखाने का क्या मतलब और वजह है? संसद में जो दलील दी गई उसमें कहा गया की चुकी जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न अंग है इसलिए अलगाववादी भी इस देश के नागरिक हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इस बात का एहसास सरकार को पहले नहीं था? हां, इसकी एक वजह बैंकॉक में भारत –पाकिस्तान के बीच एनएसए स्तर की बातचीत में छिपी हो सकती है।
अलगाववादी संगठनों को लेकर मोदी सरकार लगातार कड़ा रुख अपनाती रही है। लेकिन बैंकॉक में भारत-पाकिस्तान के एनएसए के बीच मुलाकात के बाद सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत की उम्मीद जगी थी। इससे यह भी स्पष्ट हो गया की पाकिस्तान और हुर्रियत के बीच मुलाकात पर रोक लगाकर सरकार खुद की मुश्लिक बढ़ा रही है। जिसके बाद ये फैसला लिया गया।

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