सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कांफ्रेंस से उठे कई सवाल, देश में ऐसा पहली बार हुआ है

नई दिल्ली: शुक्रवार का दिन न्यायपालिका के इतिहास में हमेशा याद किया जाता रहेगा। जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने मीडिया के सामने अपनी बात रखी। सुप्रीम कोर्ट के चार जज जिनमें जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने 7 पन्नों की प्रेस रिलीज जारी की। जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए थे। चारों वर्तमान जजों ने जो बातें कही उसका मतलब ये था कि देश में लोकतंत्र खतरे में है और सुप्रीम कोर्ट की साख खतरे में है।

जजों ने जो चिट्ठी जारी की है वो वही चिट्ठी है जिसे उन्होंने तकरीबन दो महीने पहले मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखी थी। ये पहली बार है जब जजों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखी चिट्ठी इस तरह से मीडिया के सामने सार्वजनिक की हो। जजों ने कुछ मामलों के असाइनमेंट को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। उनका आरोप था कि मुख्य न्यायाधीश की तरफ से कुछ मामले चुनिंदा बेंचों और जजों को ही दिये जा रहे हैं।

सौजन्य- टीवी टुडे

चिट्ठी में जजों ने लिखा है

हमारी बात नहीं सुनी जा रही है इसलिए मजबूर होकर मीडिया के सामने आना पड़ा। चीफ जस्टिस को लिखी चिट्ठी में जजों न लिखा था आपको लेटर के जरिये सारी बातें बताई जा रही हैं। हाल में जो आदेश पारित किये उससे न्याय प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ा है। साथ ही सीजएआई के ऑफिस और हाई कोर्ट के प्रशासन पर सवाल उठा है।

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सीजेआई खुद ही उन मामलों में अथॉरिटी के तौर पर आदेश नहीं दे सकती। जिन्हें किसी और उपयुक्त बेंच ने सुना हो चाहे जजों की गिनती के हिसाब से ही क्यों ना हो। इस सिद्धांत की अवहेलना अनुचित और अवांछित है। इससे कोर्ट की गरिमा पर संदेह होता है।

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इस चिट्ठी में एक केस का भी जिक्र किया गया है। 27 अक्टूबर 2017 को आरपी लूथरा बनाम केद्र को आपने सुना था। पर एमओपी के मामले में सरकार को पहले ही कहा जा चुका है कि वह इसे फाइनल करे। ऐसे में इस मामले को संवैधानिक बेंच को ही सुनना चाहिए कोई और बेंच नहीं सुन सकता।

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एमओपी के निर्देश के बाद भी सरकार चुप है। ऐसे में ये माना जाय कि सरकार उसे मान चुकी है। कोई और बेंच उसपर टिप्पणी नहीं करे। जस्टिस कर्णन केस का भी जिक्र किया गया। और कहा कि जजों की नियुक्ति को लेकर सवाल उठे थे और उसे दोबारा देखने को कहा था। साथ ही महाभियोग का विकल्प भी तलाशने को कहा था। पर फिर भी एमओपी की चर्चा नहीं हुई थी।

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चारों जजों का आरोप है कि उन्होंने जिन बातों की शिकायत सीजेआई के सामने की थी उसपर कुछ भी नहीं किया गया। चीफ जस्टिस ने हमारी बात नहीं सुनी इसलिए मजबूर होकर मीडिया के सामने आना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है। जिससे न्यायपालिका की निष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं। 2 महीने से चल रहे घटनाक्रम के चलते हम मजबूर हुए।

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