ROHINGYA

रोहिंग्या के लिए इतनी हाय तौबा क्यों मचा रहे हो, क्यों भारत में उन्हें बसाया जाए?

रोहिंग्या के लिए इतनी हाय तौबा क्यों मचा रहे हो, क्यों भारत में उन्हें बसाया जाए?

नई दिल्ली:  बर्मा (म्यांमार) से खदेड़े गए रोहिंग्या (मूलत: मुसलमान) समुदाय के लोगों के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर संवेनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। कुछ लोग छाती  पीट पीट कर रहम की गुहार कर रहे हैं। बिना राष्ट्रीयता के भटक रहे इन सरणार्थियों को भारत में बसाने के लिए तरह तरह की दलीलों के साथ फरियाद कर रहे हैं। सब कुछ वैसा ही है जैसा अमूमन बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले में होता आया है।

जबकि कानून की नज़र में ये भारत की धरती पर अवांछित, गैर कानूनी शरणार्थी हैं। बिना सरकार की इजाजत के इन्हें एक मिनट भी यहां रहने का हक़ नहीं है। इसके बावाजूद, इंसानियत, इतिहास और जाने कितनी तरह की दलीलों के जरिये रोहिंग्या को भारत में बसाने की पुर जोर पैरवी की जा रही है, और ये पैरवी करने वाले वही लोग हैं जिन्हेंने आज तक एक बार भी कश्मीरी पंडितों के साथ हुई नाइंसाफी को इंसानियत की नज़र से देखने की जहमत तक नहीं उठाई।

इन लोगों को फिलिस्तीनियों के साथ होने वाला ‘जुल्म’ तो परेशान करता है लेकिन बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समाज के खिलाफ होने वाली एथनिक क्लीनसिंग पर सांप सूंघ जाता है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय का सरकारी सफाया भी इनके लिए कभी भी जुल्म और ज़्यादती की श्रेणी में नहीं आया। लेकिन ये चाहते हैं कि भारत रोहिंग्या को ‘इंसाफ’ दिलाये, बर्मा में उन्हें मान्यता दिलवाए नहीं तो भारत में बसाये। पर सवाल सवाल उठता है क्यों ?

भारत क्यों किसी देश के मामले में दाखल दे? क्यों रोहिंग्या के लिए बर्मा से संबंध बिगाड़े । क्या सिर्फ इसलिए कि ये कुछ ऐसे सेलेक्टिव लोगों की ख्वाहिश है जिनकी आवाज़ निकलने से पहले  प्रभावितों के नाम और उसमें मजहब ढूंढती है ? या इसलिए कि ये तबका सेकुलरिज्म और कमुनालिस्म का सर्टिफिकेट बांटता है, फिर चाहे इनकी अपनी सोच और चरित्र में कुछ भी क्यों न छिपा हो ।

रोहिंग्या के लिए रोने वालों की इंसानियत के लिए इम्तेहान की घड़ी है। अगर वाकई उनके दिल इस नाइंसाफी के खिलाफ इतना गुस्सा और दर्द है तो सरकार पर दबाव बनाने की बजाय अपनी पूरी संपत्ति , जायदाद और जमा पूंजी खर्च कर इनकी मदद करें। भाई लोग सिर्फ दर्द बांटने का नाटक न करें थोड़ी दौलत भी बांट ले। परोपकार के लिए पूरी बांट देंगे तो सवाब मिलेगा। सरकार को बक्श दें, बहुत खरचे हैं उसके पास।

नोट: ये आर्टिकल वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी सिंह के फेसबुक वॉल से लिया गया है

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