पूर्णिया:मखाने की पत्ती, डंठल व फल के छिलके में है औषधीय गुण : डॉ विद्यानाथ झा 

प्रियांशु आनंद/पूर्णिया

पूर्णिया/बिहार: भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय पूर्णिया के द्वारा आयोजित  पांच दिवसीय आत्मा, दरभंगा बिहार द्वारा प्रायोजित प्रशि़क्षण कार्यक्रम मखाना उत्पादन एवं प्रसंस्करण तकनीक के तकनीकी सत्र के दूसरे दिन मुख्य वक्ता डाॅ विद्यानाथ झा, प्राचार्य, एमआरएम काॅलेज, दरभंगा ने उपस्थित मखाना किसानों को मखाना के औषधीय एवं पोषण गुणों के बारे विस्तारपूर्वक जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि विदेशों में मखाना के बीज से मधुमेह रोग के लिए औषधि बनाई जा रही है जबकि यहां उसका उपयोग लावा बनाने के समय इंधन के रूप में कर लिया जाता है। उन्होंने मणिपुर की तर्ज पर मखाने की पत्ती, डंठल, एवं फल के छिलके व एरील सदृश भागों का भी प्रयोग करने की अावश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि ये कई प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हें। सूबे में केवल इसके लावे का उपयोग किया जाता है और अन्य भागों को यूं ही छोड़ दिया जाता है जो कहीं से भी उचित नहीं है।

डाॅ इन्दुशेखर सिंह, वरीय वैज्ञानिक मृदा विज्ञान, मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा ने तकनीकी सत्र के दूसरे दिन प्रशिक्षणार्थियों को जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष में मखाना उत्पादन तकनीक की जानकरी दी। उन्होंने बताया कि मखाना की खेती जलजमाव वाले क्षेत्र में की जानी चाहिए। बदलते मौसम, नई सड़क व रेल लाइन बनने से जलनिकासी की समस्या बढ़ती जा रही है। अधिक वर्षा होने पर खेती योग्य भूमि मे जलजमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जहां मखाना एवं सिंघाड़े की खेती सफलता पूर्वक कर किसान अपनी आय को बढ़ा सकते हैं।

आजादी मिलने के समय से ही खाद्य सुराक्षा देश का एक बड़ा लक्ष्य रहा है जिसके लिए भारत सरकार ने वर्ष 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया। रविंद्र कुमार जलज ने मछली संचयन, तालाब प्रबंधन तालाब की तैयारी, अंगुलिका संचय के पूर्व पुराने तालाबों को गर्मी के मौसम में सूखाकर जुताई करनी चाहिए। इससे सभी अंवाछित मछलियों, जलीय खर पतवारों से मुक्ति मिल जाती है एवं तालाब में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है।

तालाब से अगर जल निकासी संभव न हो तब जलीय पौधों की सफाई मजदूरों से करानी चाहिए। रासायनिक दवाओं के प्रयोग से पानी का जहरीलापन कई दिनों तक बरकरार रहता है। जलकुंभी के उन्मूलन के लिए 2, 4 डी रसायन का प्रयोग उसकी अवस्थानुसार 2 से 10 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से किया जा सकता है।

...खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग :

प्रति माह गोबर का प्रयोग 1000 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से तालाब में करना चाहिए। मध्यम मृदा उपजाऊ वाले तालाब में 150 से¢200 किग्रा प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष के दर से नाईट्रोजन एवं 75 से¢100 किग्रा प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष के दर से फास्फेट उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। नर्सरी तालाब में खाद एवं उर्वरक मिश्रण जिसमें गोबर 200 किग्रा/हेक्टेयर, सरसों खल्ली 750 किग्रा/हेक्टेयर तथा सिंगल सुपर फास्फेट 50 किग्रा/हेक्टेयर के मिश्रण का प्रयोग करने से आवश्यक प्लवकों की संख्या बहुत कम दिनों में उत्पन्न होती है। इसी मिश्रण को सात दिनों के पश्चात फिर से नर्सरी तालाब में दिया जाना चाहिए।

कृत्रिम भोजन व पूरक आहार :

मत्स्य आहार के रुप में सरसों की खल्ली, चावल कुन्नी, राईसब्रान, मकई आटा मिनरल एवं विटामिन मिश्रण इत्यादि मिलाकर प्रतिदिन देना चाहिए। जिसमें राइस ब्रान/मकई आटा एवं सरसो खल्ली की मात्रा बराबर होनी चाहिए। वहीं स्पॉनों के भोजन के लिए राइस ब्रान एवं सरसों खल्ली मिश्रण का प्रयोग किया जाता है। पहले सात दिन स्पान के कुल संचित वजन का चार गुणा भोजन दिया जाना चाहिए जिसमें राइस ब्रान एवं सरसो खल्ली की मात्रा बराबर होनी चाहिए। दूसरे सप्ताह में भोजन की मात्रा मत्स्य बीजों के वजन का आठ गुणा हो जाती है। स्पॉनों के भोजन के लिए राइस ब्रान एवं सरसो खल्ली के मिश्रण को पाउडर बनाकर तालाब में छिड़काव करना चाहिए। दरभंगा के किसान मोहन सहनी, राजन कुमार झा, विनोद राम, प्रभात कुमार राम, विमल सहनी, मोहन सहनी, राजू सहनी, गोविन्द सहनी, उपेन्द्र कुमार यादव, संतोष यादव एवं पप्पू सहनी आदि मखाना कृषकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

इस मौके पर महाविद्यालय के अन्य वैज्ञानिक डाॅ पारसनाथ ने अपना सहयोग प्रदान किया। छात्र छात्राओं का सक्रिय सहयोग रहा। कार्यक्रम  का संचालन मुख्य समन्वयक मखाना वैज्ञानिक डाॅ अनिल कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन सह समन्वयक डाॅ पंकज कुमार यादव द्वारा किया गया।

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