JNU में देशद्रोही सोच पर क्यों भिड़े राजनीतिक दल के नेता ?

JNU में देशद्रोही सोच पर क्यों भिड़े राजनीतिक दल के नेता ?

JNU में देशद्रोही सोच पर क्यों भिड़े राजनीतिक दल के नेता ?

देशद्रोही सोच राजनीतिक लड़ाई कैसे बन गई ?

क्या ये केवल चंद दिनों का शोर है फिर सब सामान्य हो जाएगा ?

दिल्ली की दो पहाड़ियों अरावली की पहाड़ी और रायसीना की पहाड़ी के बीच में सियासत का कद कितना बौना हो सकता है इसका एहसास पिछले दिनों हुआ। जब JNU में देश विरोधी नारे लगाए गए। 9 फरवरी को नारा लगाया गया सरकार तक ये खबर तब पहुंची जब वीडियों सोशल साइट पर वायरल हो गया।

शुरुआत में तो सरकार ये पता ही नहीं था कि जिस JNU पर देश को नाज है अरावली की पहाड़ी बने उसी JNU की तलहटी में देश विरोधी सोच पनप रही है। आतंकी अफजल गुरु के समर्थन में वहां कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। उसके समर्थन में नारे लगाए जाते हैं। और पूरी सरकार बेखबर रहती है। विवाद परवान चढ़ना तब शुरु हुआ जब JNU छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया जाता है।

जिस देशद्रोह पर सभी राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर उसे और फैलने से रोकने के लिए कोई कदम उठाने पर चर्चा करनी चाहिए थी वही राजनीतिक दल JNU के मुद्दे पर देशद्रोही और देश भक्त में बंट गई। जिन लोगों ने कन्हैया के खिलाफ आवाज उठाई वो तानाशाह कहे गए और जिन्होंने कन्हैया का समर्थन किया उनके लिए देशद्रोही की संज्ञा तय की गई। यानि जेनयू का मुद्दा राजनीतिक दलों के बीच की लड़ाई बन गया।

पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने JNU के मंच से केंद्र सरकार पर हमला किया। राहुल ने अपने आक्रामक तेवर और भाषण में कहा JNU में पुलिस कार्रवाई गलत है, निर्दोष छात्रों को परेशान करना गलत है और जो सरकार बोलने की आजादी पर पाबंदी लगाती है वो सरकार तानाशाह है। राहुल के बयान पर अबतक खामोश रहे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी चुप्पी तोड़ी। शाह ने राहुल की सोच को देश विरोधी बता दिया। साथ ही उनसे JNU मे दिये अपने बयान के लिए माफी की मांग कर दी।

वामदल तो शुरुआत से है JNU के मुद्दो को केंद्र सरकार के विरोध में मोड़ने में लगी रही। इतना ही नहीं वामदलों के नेताओं ने एक साथ कई बातें कहीं। पहली ये की JNU में किसी देश विरोधी गतिविधि का वो समर्थन नहीं करते। दूसरी ये की कन्हैया का गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया। से रिहा किया जाए और तीसरा ये की केंद्र सरकार आपातकाल की तरह काम कर रही है।

वामदल की तरफ से JNU के लिए इस सोच को दिखाने की मजबूरी है। क्योंकि पश्चिम बंगाल की जनता वाम दलों को बेदखल कर चुकी है। सीताराम येचुरी, प्रकाश करात जैसे कई ऐसे नेता हैं जो JNU से ही निकलकर आए हैं। ये भी सही है किJNU वामपंथी विचारधारा का गढ़ है। और JNU में जिस तरह से हाल के दिनों में गतिविधि दिखाई दे रही है उससे वामदलों के नेताओं को ये डर सताने लगा है कि कहीं JNU भी उनके हाथ से न निकल जाए।

आम आदमी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं है। दिल्ली सरकार पहले ही JNU में देशद्रोही नारे की जांच मजिस्ट्रेट को सौंप चुकी है। हलांकी आप वाले नेता या सीएम अरविंद Kejriwal अबतक JNU कैंपस का दीदार करने तो नहीं पहुंचे हैं। लेकिन सोशल साइट्स पर केंद्र सरकार के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। सीएम Kejriwal पीएम नरेंद्र मोदी के नाम चिट्ठी भी लिख चुके हैं।

यानि कुल मिलाकर जिस मुद्दे पर सभी को एक साथ आना चाहिए था उस अहम मुद्दे पर सभी दल अपनी अपनी अलग अलग रणनीति के तहत काम कर रही है। जिसमें कोशिश इस बात की हो रही है कि JNU के मुद्दे पर संजीदगी भी दिखा दी जाए, अपना हित भी साध लिया जाए और विरोधी को गलत भी ठहरा दिया जाए।

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