जानिये पनीरसेल्वम कैसे बन गए जयललिता के सबसे करीबी?




नई दिल्ली: जयललिता के निधन के बाद पनीरसेल्वम तमिलनाडु के सीएम बने। वो राज्य के 20वें मुख्यमंत्री हैं। पनीरसेल्वम जयललिता सरकार में वित्त मंत्री थे। उन्हें जयललिता का बेहद करीबी माना जाता है। यही वजह है कि वो कई बार कार्यवाहक मुख्यमंत्री भी रह चुके थे। जयललिता से उनकी करीबी ही थी कि जया के निधन के बाद उन्हें तमिलनाडु का सीएम बनाया गया।

पनीरसेल्वम पहली बार जयललिता से शशिकला के रिश्तेदार टीटीके दिनाकरन के जरिये मिले थे। राजनीति में उन्हें OPS के नाम से जाना जाता है। जिस तरह पीएम बनने से पहले नरेंद्र मोदी चाय बेचते थे उसी तरह से पनीरसेल्वम भी चाय बेच चुके हैं।

2001 में तांसी जमीन घोटाले में सजा पाने के बाद जयललिता ने विधायक पनीरसेल्वम को राज्य का सीएम बना दिया था। पनीरसेल्वम दो बार तमिलनाडु के सीएम रहे। लेकिन उनका जया के इतने करीब होने की सियासी वजह भी थी। सेल्वम थेवर कम्युनिटी से आते हैं। इसका राज्य में काफी प्रभाव है। इस वोटबैंक को जया ने काफी वक्त तक भुनाया भी था। पिछले दो चुनाव में थेवर कम्युनिटी का 70 फीसदी वोट AIADMK को मिला।

राजनीति में आने से पहले पनीरसेल्वम खेती करते थे। वो तमिलनाडु में विपक्ष के नेता की भूमिका भी निभा चुके हैं। पनीरसेल्वम राजनीति में ये सोचकर आए थे कि वो पेरियाकुलम नगरपालिका के प्रेसिडेंट बनेंगे। इस छोटे सपने को लेकर राजनीति में आनेवाले पनीरसेल्वम ने कभी ये कल्पना नहीं की थी कि एक दिन वो राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे। 23 साल की राजनीति में अब वो राज्य के सीएम की कुर्सी पर बैठ चुके हैं।

जया की तरफ से पनीरसेल्वम को जो भी जिम्मेदारी सौंपी गई उन्होंने उसे ईमानदारी से पूरा किया। यही वजह है कि वो जया के सबसे करीबी बन गए थे। पनीरसेल्वम के भाई आज भी पेरियाकुलम में चाय की दुकान चलाते हैं।

जया से करीबी की वजह से पार्टी के भीतर पनीरसेल्वम से जलनेवालों की भी कमी नहीं है। इसलिए अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो पार्टी को किस तरह से एकजुट रखते हैं। ये संभावना भी जताई जा रही है कि जयललिता की एक और करीबी शशिकला भी पार्टी पर वर्चस्व हासिल करना चाहेंगी। अगर ऐसा होता है तो पनीरसेल्वम की मुश्किल बढ़ सकती है क्योंकि आखिरकार फंड तो पार्टी के पास ही है।

पनीरसेल्वम के पास दूसरी मुश्किल ये है कि उनके पास रामचंद्रन या जयललिता जैसी कोई करिश्माई किरदार नहीं है। ऐसे में सबसे पहले उन्हें पूरी पार्टी का भरोसा जीतना होगा। अगर वो ऐसा करने में विफल रहते हैं तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी टूट के कगार पर आकर खड़ी हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो इसे पनीरसेल्वम की विफलता में गिना जाएगा।

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