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रियल एस्टेट कंपनी दिवालिया हो तो होम बायर्स के सामने ये विकल्प हैं

रियल एस्टेट कंपनी दिवालिया हो तो होम बायर्स के सामने ये विकल्प हैं

नई दिल्ली:  जिन लोगों ने जेफी बिल्डर पर भरोसा किया था और उसके प्रोजेक्ट में पैसा लगाया था उनके सामने एक बहुत बड़ी मुश्किल आ गई है। क्योंकि जेपी बिल्डर दिवालिया होने के कगार पर है। ऐसे में तकरीबन 30 हजार होम बायर्स के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है। क्योंकि इन्होंने जो घर का सपना संजोया था वो खटाई में दिखाई दे रहा है।

अगर आप भी उन लोगों में से हैं जिन्होंने जेपी बिल्डर से घर खरीदा था तो आपके सामने कुछ रास्ते हैं। जिसके बारे में जानकर आपकी परेशानी कुछ कम हो सकती है। लेकिन इसके लिए आपको अपना वक्त और एकजुटता दोनों दिखानी होगी। ये पहला मामला है जब कोई रियल एस्टेट की कंपनी दिवालिया होने के कगार पर खड़ी है वो भी तब जब उसके कई प्रोजेक्ट अधूरे हैं और वहां काम चल रहा है।

इकनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट में ऐसे हालात के लिए कुछ रास्ते सुझाए गए हैं। जिसके तहत

नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल यानि NCLT की तरफ से जेपी बिल्डर की दिवालिया प्रक्रिया की देखरेख के लिए गुरुवार को इन्सॉल्वंसी प्रोफेशनल की नियुक्ति की जा चुकी है। जेपी प्रोजेक्ट्स के बायर्स 24 अगस्त तक क्लेम कर सकते हैं।

अपने घर के लिए अगर आपने बैंकों से लोन लिया है और पजेशन नहीं मिला है तो आप उसका ईएमआई चुकाना बंद नहीं करें। क्योंकि एमआई चुकाना बंद करने के बाद बायर्स की क्रेडिट रेटिंग नेगेटिव होने का खतरा बढ़ जाएगा। साथ ही दिवालिया प्रक्रिया के दौरान उनका दावा भी कमजोर पड़ सकता है।

NCLT की तरफ से जो इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स नियुक्त किये हैं वो कंपनी के लिए रिवाइवल प्लान तैयार करेंगे। ये पूरी प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में होगी। लेकिन जेपी बिल्डर के मामले में ये प्रक्रिया जरा पेचीदा है क्योंकि हजारों बायर्स ने कंपनी में निवेश किया है। इसके बाद भी अगर कंपनी की स्थिति नहीं सुधरती है तो कर्ज चुराने के लिए कंपनी की परिसंपत्तियां बेची जाएगी।

अगर कंपनी रिवाइव नहीं होती है तो फिर एक और रास्ता ये है कि बैंक कंपनी के इक्विटी को खरीद लें। क्योंकि संकटग्रस्त कंपनी की संपत्ति की अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद कम होती है। क्योंकि खरीदार उसकी कम कीमत लगाते हैं। हलांकि बाद में इन संपत्तियों की सही कीमत मिल सकती है। इसलिए बैंक तुरंत में कंपनी की संपत्ति बेचने के बजाय कंपनी का इक्विटी खरीद सकते हैं।

कंपनी के रिवाइव होने की जब सारी उम्मीद खत्म हो जाएगी तो उसकी संपत्तियों को बेचकर कर्जदाताओं के पैसे चुकाए जाएंगे। लेकिन जेपी बिल्डर के मामले में बायर्स कंपनी के वास्तविक कर्जदाता होंगे लेकिन उन्हें सिक्यॉर्ड कर्जदाता की तरह अधिकार प्राप्त नहीं होगा और बायर्स को बैंकों के मुकाबले कम तवज्जो दी जाएगी। परिसंपत्तियों को बेचकर जो पैसा जुटाया जाएगा सबसे पहले उसे बैंकों में बांटा जाएगा उसमें से बचने के बाद बायर्स का नंबर आएगा।

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