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रियो में एथलीट ओपी जैशा प्यास से मर रही थी, अधिकारी आराम कर रहे थे !

रियो में एथलीट ओपी जैशा प्यास से मर रही थी, अधिकारी आराम कर रहे थे !

किसी भी ओलंपिक समारोह में खिलाड़ियों के दल की रवानगी के बाद इंतजार इस बात की होती है कि वो पदक जीतकर वापस लौटे। भारतीय एथलीट ओपी जैशा को भी इसी उम्मीद के साथ रियो भेजा गया था। जैशा 42 किलोमीटर की मैराथन रेस में शामिल होने रियो ओलंपिक गई थीं। लेकिन रेस के दौरान जैशा की जान पर बन आई। क्योंकि जिस वक्त जैशा ट्रैक पर अपने देश को मैडल दिलाने के लिए दौड़ लगा रही थी उस वक्त एथलेटिक्स फेडरेशन के अधिकारी एसी कमरे में खुद के शरीर को आराम दे रहे थे। क्योंकि उस वक्त रियो में बाहर का तापमान 43 डिग्री सेंटीग्रेट था।

आसमान में आग उगलते सूरज की तेज धूप की तपिश में जैशा ट्रैक पर दौड़ लगा रही थी। तेज धूप उसके शरीर से पानी निचोड़ रहा था और एथलेटिक्स फेडरेशन के अधिकारी आराम फरमा रहे थे। क्योंकि उन्हें इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं था कि उनके दल का एक खिलाड़ बगैर पानी और एनर्जी ड्रिंग के 43 डिग्री के तापमान में 42 किलोमीटर की रेस में दौड़ रहा है। ओपी जैशा ने अपने ही देश के अधिकारियों के बुरे बर्ताव के बारे में कहा
‘वहां काफी गर्मी थी। दौड़ सुबह नौ बजे से थी, मैं तेज गर्मी में दौड़ी। हमारे लिए ना ही पानी का इंतजाम था न ही कोई एनर्जी ड्रिंक थी और न ही कोई खाना। केवल एक बार आठ किलोमीटर में रियो के आयोजकों से मुझे पानी मिला। जिससे कोई मदद नहीं मिली। सभी देशों के हर दो किलोमीटर पर अपने स्टॉल थे। लेकिन हमारे देश का स्टॉल खाली था। हमें हमारे तकनीकी अधिकारियों द्वारा ड्रिंग दी जानी थी। यह नियम है। हम किसी अन्य टीम से पानी नहीं ले सकते। मैने वहां भारतीय बोर्ड देखा लेकिन वहां कुछ नहीं था। मुझे काफी परेशानी हो रही थी। मैं रेस के बाद बेहोश हो गई। मुझे ग्लूकोज दिया गया, मुझे लगा मैं मर जाऊंगी।‘

एथलेटिक्स फेडरेशन ने जिस तरह का बर्ताव जैशा के साथ किया वो माफी के लायक भी नहीं है। अगर इस हालात में खिलाड़ियों को अपना प्रदर्शन करना पड़े तो ऐसे में उनसे पदक की उम्मीद भी बेइमानी है। क्योंकि बगैर जरुरी सुविधा और इंतजामों के अगर खिलाड़ियों से प्रदर्शन करने और नतीजे लाने को कहा जाएगा तो ये नामुमकिन है। ये सच है कि मैदान पर खिलाड़ियों को प्रदर्शन करना है। लेकिन उस प्रदर्शन के दौरान खिलाड़ी का हौसला बढ़ाने के लिए जरुरी है कि वहां एथलेटिक्स फेडरेशन के अधिकारी भी मौजूद रहें। अधिकारियों को ये भी समझना होगा कि उन्हें एसी कमरों में आराम करने के लिए नहीं भेजा गया है। उनकी अपनी जिम्मेदारी है। जिसे उन्हें निभानी है। खिलाड़ियों के साथ वो केवल फोटो अपॉरच्यूनिटी के लिए नहीं गए होते हैं। अगर खिलाड़ी मैदान पर अपना पसीना बहा रहा होता है तो उससे उस खिलाड़ी के शरीर में होनेवाली पानी की कमी को पूरा करने के लिए एनर्जी ड्रिंक और पानी मुहैया कराने की जिम्मेदारी एथलेटिक्स फेडरेशन के अधिकारियों की ही होती है। कोरोड़ों रुपये खर्च कर उन्हें केवल सूटबूट में सैर सपाटे के लिए नहीं भेजा जाता है।

खिलाड़ी अगर कामयाबी के लिए जान लड़ा रहे होते हैं तो उनके जज्बे का बरकरार रखने की जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों की होती है जो उस दल के साथ जाते हैं। लेकिन जैशा के साथ ऐसा नहीं हुआ। हजारों किलोमीटर दूर रियो में वो अकेले धूप की तपिश में दौड़ रही थी। जहां पर उसे मदद की जरुरत महसूस हुई तो उसने भारतीय स्टॉल की तरफ निगाहें घुमायीं लेकिन वहां सन्नाटा था। कोई अधिकारी वहां मौजूद नहीं था जो उसे पानी या फिर एनर्जी ड्रिंक देता।

42 किलोमीटर के मैराथन को पूरा करने में ओपी जैशा को दो घंटे 47 मिनट और 19 सेकेंड का वक्त लगा। रेस में वो 89वें स्थान पर रहीं। इसे निराशाजनक प्रदर्शन कहा जा रहा है। लेकिन हमें निराश जैशा ने नहीं किया है हमें निराश और शर्मसार किया है एथलेटिक्स फेडरेशन ने। जो उस वक्त मैदान पर मौजूद नहीं था। क्योंकि उन्हें एसी कमरों में ज्यादा सुकून मिल रहा था। जहां वो स्नैक्स के साथ चाय पार्टी कर रहे थे।

ओपी जैशा के आरोप पर एथलेटिक्स फेडरेशन का कहना है कि रियो में भारतीय अधिकारियों को एथलीट या उनके कोचों द्वारा कसी भी ड्रिंक की विशेष जरुरत के बारे में नहीं बताया गया था। एएफआई के सचिव सीके वाल्सन भी रियो में मौजूद थे। उनके मुताबिक ये आयोजकों की जिम्मेदारी होती है कि वे पानी और एनर्जी ड्रिंक मुहैया कराए। इसके लिए पूरे कोर्स में पानी और एनर्जी ड्रिंक के कई स्टेशन होते हैं। हम भी एथलीटों को पानी और एनर्जी ड्रिंक दे सकते थे लेकिन किसी ने भी और न ही उनके कोचों ने हमें इसके बारे में सूचित किया कि उन्हें अलग से पानी और एनर्जी ड्रिंक की जरुरत है।
इस बारे में जब खेल मंत्री विजय गोयल से पूछा गया तो उनका कहना था कि भारतीय एथलेटिक्स महासंघ की जिम्मेदारी थी। हर बार कोई छोटी घटना होती है तो हम इसका संज्ञान लेते हैं। यह एएफआई का काम था। यह महासंघ की जिम्मेदारी है उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी।

बात अब भी वहीं पर अटकी है कि जिम्मेदारी किसकी थी और कौन अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक गया। हर कोई दूसरे को जिम्मेदार बता रहा है। खेल मंत्री एथलेटिक्स महासंघ की जिम्मेदारी बता रहे हैं। एथलेटिक्स महासंघ आयोजकों की जिम्मेदारी बता रहे हैं। यानि इस महा गलती से सीख लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। क्योंकि सभी को फिक्र खुद को पाकसाफ बताने की है। यहां खुद को कोई भी दागदार नहीं दिखाना चाहता है। फिर चाहे ओलंपिक में ऐसे ही एक-दो मेडल मिले या वो भी न मिले इन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि इन्हें पता है इनका सैर सपाटा जारी रहेगा। और इनके इस लापरवाह रवैये के बीच अगर खिलाड़ी एक मेडल भी जीत लेते हैं तो उनके जज्बें को सलाम है।

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