ओडिशा में दानामांझी 10 किलोमीटर तक कंधे पर ढोता रहा पत्नी का शव

भुवनेश्वर: 70 साल पुराने लोकतांत्रिक देश में ऐसी तस्वीर कभी दिखाई देगी इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। ओडिशा के कालाहांडी से ये तस्वीर जो संदेश लेकर सामने आई है वो एक आईना है पूरे सिस्टम पर। जहां अरबों की नीति तैयार होती है। लेकिन बाबुओं की नियति कौड़ी के मोल बिक जाती है। यही वजह है कि दानामांझी को अपनी मृत पत्नी अमंग देई के शव को अपने कंधे पर लेकर 10 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। अमंग देई की मौत टीबी से हुई थी। राज्य सरकार की तरफ से इस तरह की मौत पर ‘महापरायण’ योजना की शुरुआत की गई थी। लेकिन अमंग देई के शिथिल शरीर को नवीन पटनायक सरकार की उस योजना का लाभ नहीं मिला।

अमंग देई की मौत बुधवार सुबह भवानीपटना के जिला अस्पताल में टीबी से हो गई। उस अस्पताल से अमंग देई के घर की दूरी 60 किलोमीटर थी। अमंग देई के पति दानामांझी ने अस्पताल प्रशासन से पत्नी के शव को घर तक ले जाने के लिए गाड़ी का इंतजाम करने की मिन्नत की। दानामांझी के मुताबिक उसके पास इतने पैसे नहीं थे जिसे वो गाड़ी का इंतजाम करने के बदले अस्पताल वालों को दे पाते। दानामांझी तो गरीब था लेकिन अस्पताल के कर्मचारी उससे भी गरीब निकले। जिन्होंने पैसे नहीं मिलने पर दानामांझी की पत्नी के शव को उसके घर पहुंचाने के लिए गाड़ी नहीं दिये। अस्पताल से जब कोई मदद नहीं मिली तो दानामांझी ने अपनी पत्नी के शरीर को कपड़े में लपेटा। और कंधे पर उठाकर घर की तरफ चल पड़ा। पत्नी के शव को लेकर सड़क पर बढ़ते दानामांझी के कदमों के नीचे ओडिशा में नवीन पटनायक की बनाई अपंग व्यवस्था कुचल रही थी। लेकिन उस व्यवस्था के हुक्मरानों के मुंह से कराह की आवाज तक नहीं निकल रही थी। क्योंकि वो तो अमंग देई से पहले ही मर चुके थे। कालाहांडी वालों ने भी दानामांझी को अपनी पत्नी का शव लेकर जाते देखा। आपस में फुस फुसाकर उन्होंने बात भी की लेकिन मदद करने की हालत में कोई नहीं था। क्योंकि वहां सभी लाचार थे। दानामांझी को 60 किलोमीटर चलना था अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लेकर। क्योंकि अस्पताल से घर की दूरी इतनी ही थी। लेकिन 10 किलोमीटर के बाद कुछ लोगों ने उसे देखकर जिला कलेक्टर को फोन किया फिर उसके लिए एंबुलेंस की व्यवस्था की गई। और फिर शेष 50 किलोमीटर का फासला एंबुलेंस में तय किया।

अस्पताल में दनामांझी की पत्नी दम तोड़ चुकी थी। उसकी 12 साल की बेटी अपनी मां के सामने आंसुओं का सैलाब लेकर खड़ी थी। ओडिशा की पटनायक सरकार के राज में उस वक्त केवल अमंग देई का शरीर ही ठंडा नहीं पड़ा था पूरा सिस्टम अपनी संवेदनाओं का गला घोंट चुका था। अमंग देई की 12 साल की बेटी नवीन पटनायक की उस सरकार के राज में अपने आंसू बहा रही थी जो मृत व्यवस्थाओं का शासन चलाते हैं और जिनके सत्ता में सहानुभूति के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है।

कोई भी इंसान जिसके दिल में रत्ती भर भी जजबात कायम होगा वो सोच सकता है उस मंजर के बारे में जब दानामांझी ने अपनी पत्नी के शव को अपने कंधे पर उठाया होगा। उस बेटी पर क्या बीत रही होगी जो अपने पिता के सीने से लगकर रो भी नहीं सकती थी। क्योंकि उसके पिता ने उसकी मां के शव को अपने कंधे पर उठा रखा था। दुनिया को 12 साल की उस बेटी के आंसू दिखाई दे रहे थे लेकिन उसके दिल में सिस्टम के प्रति किस हद तक घृणा ने अपनी जगह बनाई थी उसका एहसास किसी को नहीं था। अगर एहसास होता को कालाहांडी की ये तस्वीर जो एक आईना है, चीख चीख कर ये नहीं कह रही होती की अगर हिम्मत है तो मुझमें झांक कर देखो।

Loading...