BJP के खिलाफ खेमा बनाने में जुटे नीतिश कुमार !

BJP के खिलाफ खेमा बनाने में जुटे नीतिश कुमार !

ये कोशिश पहली बार नहीं हो रही है। इससे पहले भी कई बार इस तरह की बातें, इस तरह के इरादे सामने आ चुके हैं। अब ये जान लीजिये किस तरह की बातों का जिक्र हम यहां कर रहे हैं। ये है बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने का। तीसरे मोर्चे के बारे में तो आप सबों ने सुना होगा। इसे देखा भी होगा। इनके नेताओं के भाषण भी सुने होंगे आपने। सभी ने पूरे जोश के साथ खुद को एकजुट दिखाने की कोशिश की। लेकिन वो कोशिश कोई नया रंग नहीं दिखा पाई। ये तो हुई पुरानी बातें। अब नई बात जान लीजिये। इसबार बिहार के सीएम नीतिश कुमार एक अपील की है। जनता से नहीं राजनीती के महारथियों से। अपील ये है कि ‘बीजेपी के खिलाफ सभी दल एक साथ एक मंच पर आ जाएं। गैर संघवाद पर सभी दल एक हों और लोकतंत्र को बचाना है तो बीजेपी के खिलाफ एक जुट हों।‘ ये बात नीतिश कुमार ने कही है। अब इसका मतलब भी समझ लीजिये।

मतलब ये है कि बीजेपी को हटाओ और हराओ। इसके लिए सभी दलों से एक साथ आना होगा। मतलब किसी एक के बूते की बात नहीं है बीजेपी को हराना। ये सोच तब बनी है जब की लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में जीत को अगर छोड़ दें तो बीजेपी को चमत्कार नहीं दिखा पाई है। बिहार में पार्टी की बुरी गत हुई। पश्चिम बंगाल में कोई खास उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। लेकिन विरोधियों को ये एहसास जरुर है कि भविष्य में अगर बीजेपी से लड़ना है तो सभी दलों को एकजुटता दिखानी होगी । लेकिन इसमें सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या नीतीश ये अपील कोई रंग दिखा पाएगी। एक सवाल ये भी उठ रहा है कि नीतिश की इस सोच की वजह क्या है। दरअसल दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां जिनमें एक बीजेपी है और एक कांग्रेस। इन दोनों पार्टियों में से बीजेपी के पास तो काफी कुछ है लेकिन कांग्रेस की हालत पतली है।

हरियाणा में पार्टी को खुद को एकजुट रखने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। वहां पुराने विश्वासपात्र हुड्डा अपनी चूल्हा कांग्रेस से अलग करने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए जो छोटे क्षेत्रीय दल हैं वो खुद को बीजेपी के सामने खड़ा करने की कोशिश में हैं। लेकिन यहां मुश्किल ये है कि जितनी पार्टियां हैं उनकी आकांक्षाएं उतनी ही अलग-अलग है। बिहार में भले ही जेडीयू और आरजेडी के बीच मजबूरी की साझेदारी हो गई। लेकिन क्या उस तरह की साझेदारी यूपी में मायावती और मुलायम सिंह यादव दिखा पाएंगे ? शायद नहीं। क्या तमिल नाडू में जय ललिता और करुणानिधी अपनी पुरानी अदावत भुलाकर एक हो पाएंगे शायद नहीं ? क्या बंगाल में ममता बनर्जी और वामदल अपने-अपने विचार से एक दूसरे को सहमत कर पाएंगे ? शायद नहीं। जहां गैर बीजेपी दलों के बीच इतनी विषमताएं मौजूद हैं क्या वहां नीतीश की अपील हकीकत की जमीन पर अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएगी ? जवाब के लिए इंतजार कीजिये।

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