बिहार टॉपर्स घोटाले में मास्टरमाइंट पति-पत्नी गिरफ्तार

  • बिहार से भागे वाराणसी में पकड़े गए
  • अभी कई फर्जी टॉपर्स के टॉप सीक्रेट खुलने बाकी हैं

बगैर ऑपरेशन पथरी का इलाज, बगैर ऑपरेशन दृष्टि दोष ठीक करें, बगैर ऑपरेशन बवासीर का इलाज, निसंतान पति –पत्नी हकीम से मिलें…

बिहार,पटना: …इस तरह के इश्तिहार अक्सर बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, किसी स्टेशन के आउटर सिग्नल या किसी सार्वजनिक शौचालय के आसपास दी दीवारों पर दिखाई दे जाते हैं। आप सोच रहे होंगे यहां इस तरह के नीचले स्तर के दावों का जिक्र क्यों किया जा रहा है। तो इसकी वजह है… क्योंकि बिहार की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा का पूरा सिस्टम आज इसी नीचले स्तर पर पहुंच चुका है।

निसंतान पति पत्नी हकीम से मिलें और कमजोर छात्र लालकेश्वर प्रसाद सिंह, ऊषा सिन्हा, बच्चा राय जैसे शिक्षा सौदागरों से मिलें। अब काफी हद तक आपको ये समझ आ गया होगा कि हमने क्यों शुरुआत में निचले स्तर के दावों का जिक्र किया था।

बिहार में जिस तरह से फिसड्डी छात्रों को टॉपर बनाने का खेल खेला जा रहा था उसका मास्टरमाइंड था बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का पूर्व चेयरमैन लालकेश्वर प्रसाद सिंह और उनकी पत्नी और जेडीयू की पूर्व विधायक ऊषा सिन्हा।

एसआईटी ने टॉपर घोटाले के इन दोनों गुरु घंटाल को वाराणसी से गिरफ्तार कर लिया है। इनकी गिरफ्तारी के लिए एसआईटी तकरीबन पांच दिनों से वाराणसी में अपना तंबू गाड़े बैठी थी। दोनों पति –पत्नी अपने बेटे के साले विकास चंद्र की बहन के भेलपुर में बने घर में छिपे हुए थे। सोमवार को सुबह दोनों वहां से किसी आश्रम में शिफ्ट करने की तैयारी में थे। तभी एसआईटी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। विकास चंद्र को भी गिरफ्तार किया गया है।

लालकेश्वर और ऊषा सिन्हा की गिरफ्तारी के बाद अब बिहार सरकार खुद को थोड़ सहज महसूस कर रही है। इसकी वजह ये है कि घोटाले का मास्टरमाइंड सलाखों में पहुंच चुका है। बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि ‘लालकेश्वर प्रसाद सिंह और ऊषा सिन्हा की गिरफ्तार बहुत बड़ी कामयाबी है। जांच में इनके बयान काफी अहम साबित होंगे। आगे उन्होंने कहा की जो कोई भी इस मामले मे दोषी है उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। यह गिरफ्तारी ये बताती है कि सरकार दोषियों पर कार्रवाई और ऑपरेशन क्लीन के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।‘

बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री के बयान वाकई काफी प्रेरणादायक है। लेकिन इस बयान में वो जवाब शामिल नहीं है कि आखिर किस तरह से ये पूरा खेल खेला गया। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का चेयरमैन पूरी तरह से अपनी मनमानी करता रहा। उसे ना तो कानून की परवाह थी और ना ही अपने फर्ज की। क्योंकि भ्रष्टाचार की मंडी में फर्ज निभाने की सोच काफी पहले नीलाम हो चुकी थी लालकेश्वर, ऊषा सिन्हा , बच्चा राय जैसे योग्यता का बोली लगाने वाले सौदागरों के सामने। अगर कुछ बाकी बचा था तो वो सिसकता सोच जिसमें काबिल छात्र ये सोचते थे कि लालटेन की बत्ती में आंखों के जलन के बीच किताब के जिस अध्याय को उन्होंने कंठस्त किया था उसपर एक नालायक छात्र कैसे अव्वल कर गया। यहां सरस्वती पर लक्ष्मी हावी हो चुकी थी। नायालकों को अव्वल कराने का खुल्ला खेल चल रहा था चाणक्य और राजेंद्र प्रसाद के बिहार में।

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