किसी तपस्या से कम नहीं मधुश्रावणी व्रत,कठोर तपस्या के बाद होता है सफल

बसंतराय:श्रावण के मौसम में नवविवाहितों के घर मांगी ला वरदान,मांगी ला वरदान मां के शरण में जाके…..,नदिया के तीरे-तीरे माली फुलवरिया…..,कजरा जे पारि-पारि लिखल कोहवर,लिखी लेलु चारु भीत गे माई.आदि जैसे सुहाग व कोहवर गीत गूंज रही हैं।

मुधश्रवनी में नवविवाहित कन्या अपने पति की लम्बी आयु के लिए श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी में व्रत शुरू करती है और ये शिलशिला शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता रहता है।यु कहे तो इस बार ये पूजा तेरह दिनों तक चलने वाली है जो 2 अगस्त से ही शुरू हो गयी है और 14 अगस्त को सम्पन्न होगी।

मधुश्रावणी की पूजा नवविवाहित कन्या द्वारा शादी के पहले श्रावण में किया जाता है।ये पूजा पुरे मैथिल ब्राह्मण समाज की नवविवाहित कन्याओं के द्वारा पुरे जीवन चक्र में एक ही बार करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

इसी व्रत को करने का सौभाग्य प्राप्त प्रखण्ड क्षेत्र के महेशपुर गांव के अजय झा को पुत्री पूजा कुमारी को हुआ है जो पूरे विधिविधान के साथ किया जा रहा है।इसके बारे में पूजा कुमारी ने बताया कि इस व्रत का सौभाग्य नवविवाहित को एक ही बार प्राप्त होता है।जो खास पल होता है।

पहले तो इस पूजा के दौरान कोहवर आकर्षक ढंग से सजाया गया होता है।जिसके बाद इस व्रत में शिव-पार्वती,नाग-नागिन,भगवान गणेश सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति बनाकर पुरे तेरह दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है।इस पुजन के शुरू होने के बाद से ही नवविवाहिता के द्वारा पुरे व्रत के दौरान नमक का सेवन नहीं किया जाता है।नवविवाहिताओं के द्वारा ससुराल से भेजे गए पूजा सामग्री,वस्त्र,श्रृंगार सहित सुहाग के अन्य सामग्री के साथ पूजन किया जाता है।

वहीं तेरह दिनों तक चलने वाली मधुश्रावणी व्रत के दौरान नवविवाहिताए दिन में फलाहार एवं रात में अरवा भोजन करती है।रिवाज के अनुसार हर दिन पूजा के उपरान्त भाई के द्वारा उठाने का भी प्रचलन है जिसके बाद ही नवविवाहित कन्या अपने पूजा से उठ सकती हैं।इस प्रकार से तेरह दिनों तक चलने वाली इस कठोर तपस्या से पूरित पूजा में सुबह और शाम महिलाओं के द्वारा पारम्परिक गीत गाया जाता है।और समापन किया जाता है।

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