गोड्डा: अब सिल्वर स्क्रीन पर दिखेगा वंदना का जीवन संघर्ष, सेवा और समर्पण

गोड्डा/झारखंड:  जिले में एक दशक से भी ज्यादा वक्त से बिना किसी स्वार्थ के उन दर्जनों बच्चों के लिए आसरा बनीं वंदना की कहानी अब मायानगरी का सफर तय करने की तैयारी में है। मुंबई से फिल्म डायरेक्टर रंजन सिंह राजपूत ने जो बातें वंदना के बारे में कहीं वो किसी के भी दिल को छू जाएगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह से वंदना ने बिना किसी सरकारी मदद और स्वार्थ के बेघर और बेसहारा बच्चों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है उसे सामने लाना जरुरी है। क्योंकि ‘वंदना एक उड़ान’ देखने के बाद अगर एक भी और ‘वंदना’ समाज में निकल आई तो समझ लीजिये हमारी मेहनत सफल हुई।

रंजन सिंह को कुछ महीने पहले एक फेसबुक पोस्ट के जरिये वंदना के संघर्ष और समर्पण की कथा पता चली थी। दरअसल वंदना जिस पृष्ठभूमि से आकर अनाथ-बेसहारा बच्चों के लिए ममता का दूसरा नाम बन गई हैं वैसा उदाहरण और वैसा नाम काफी कम देखने और सुनने को मिलता है।

जिस तरह का काम वंदना कर रही हैं उससे या तो कोई बड़ी संस्था जुड़ी होती है या फिर कोई बहुत बड़ा नाम। जहां से सबसे बड़ी जरुरत यानि आर्थिक मदद उस फलां शख्सियत तक पहुंचाई जाती है। लेकिन वंदना के साथ इन दोनों का ही अभाव है। वो खुद को अभाव में रखकर अपने संस्था में पल रहे बच्चों की हर जरूरत पूरी करती रही हैं। वंदना की इसी सोच, इसी समर्पण और इसी संघर्ष ने तेजकिरण फिल्म के रंजन सिंह राजपूत को मुंबई से गोड्डा तक खींच लाया।

रंजन सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि अगले तीन महीने में वंदना दुबे पर बनने वाली फिल्म वंदना एक उड़ान की शूटिंग शुरु हो जाएगी। इसमें मुख्य कलाकार तो मुंबई से होंगे लेकिन बाकी स्टार कास्ट स्थानीय होंगे। उन्होंने ये भी साफ किया कि इस फिल्म में कोई स्टार नहीं होगा बल्कि एक्टर होगा। क्योंकि यहां वंदना के किरदार को दर्शकों को दिखाना है। इस फिल्म में पत्रकार राघव मिश्रा सहायक निर्देशक के तौर पर काम करेंगे।

2016 में राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित हुईं वंदना दुबे

कौन हैं वंदना दुबे?

वंदना दुबे गोड्डा में बेसहारा बच्चों के लिए 2005 से काम कर रही हैं। 2007 में उन्होंने स्वामी विवेकानंद अनाथ आश्रम की शुरुआत की। लेकिन वंदना लगातार सरकारी उपेक्षाओं का शिकार होती रहीं। सरकार की तरफ से वंदना को किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिली। लेकिन जन सहयोग और समर्थन हमेशा उनके साथ रहा। इन सरकारी उपेक्षा पर झारखंड विधानसभा में भी सवाल-जवाब हो चुके हैं। इन उपेक्षाओं के बावजूद भी वंदना अपने काम में जुटी रहीं और सिस्टम से लड़ते हुए अपने आश्रम में रह रहे बच्चों का खयाल रखती रही हैं।

वंदना एक तरफ सरकारी सिस्टम की तरफ से उपेक्षा की शिकार होती रहीं तो वहीं दूसरी तरफ उसी सिस्टम के सितारों की तरफ से उनके काम की तारीफ भी की गई। संस्था का विजिटर रजिस्टर ऐसे नामों से भरे पड़े हैं जिन्होंने वंदना की इस सेवा भावना की सराहना की है।

2016 में वंदना को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों बाल कल्याण और विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। झारखंड राज्य स्थापना दिवस समारोह में 2016 में उन्हें उत्कृष्ट सेवा पुरुस्कार मिल चुका है।

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