गोड्डा: दारोगा मास्क ना पहने तो सही, लेकिन एक बीमार बेटी का बाप मास्क न पहने तो गुनाह?

गोड्डा/झारखंड:  कोतवाली का दारोगा और कोतवाल अगर कोरोना से बचाव के लिए मास्क न पहने तो इसे जायज करार दिया जाता है। लेकिन अगर बीमारी से बेजार एक बेटी का बाप मास्क न पहने तो कानून के खिदमतगारों की नजर में एक घोर पाप है और इसे इंसाफ की किताब में जुर्म के नाम से दर्ज किया जाता है। ऐसा ही कुछ उस बेटी के बाप के साथ दारोगा जी ने किया है जिसके बदन पर पड़े कपड़ों में बने छेद उसकी लाचारी, मजबूरी, दीनता और दरिद्रता की कहानी बयां कर रही थी। आईये पहले ये जान लेते हैं कि आखिर ऐसा लिखने की वजह क्या है?

गोड्डा जिला में ठाकुर गंगटी के रेफरल अस्पताल में एक पिता अपनी बीमार बेटी का इलाज करवाने पहुंचता है। बेटी बीमार थी तन ढांकने के लिए ढंग के कपड़े भी किस्मत में नहीं लिखे थे। अस्पताल के डॉक्टर के सामने बेटी की बीमारी बता रहा था वो पिता। लेकिन डॉक्टर बाबू इस बात पर अड़े थे कि पहले चेहरे पर मास्क लगाओ। उस दीन पिता ने डॉक्टर के सामने अपनी लाचारी बयां कर दी। डॉक्टर ने उसे महागामा रेफर करने की बात कही लेकिन शर्त ये रख दी कि पहले मास्क लगाओ तभी रेफर करेंगे। लेकिन लाचार पिता के पास मास्क खरीदने के पैसे और वक्त नहीं थे। क्योंकि बेटी बीमार थी उसे इलाज की दरकार थी। पिता जिद पर अड़ा रहा और डॉक्टर अपनी शर्त पर।

मामला ठाकुरगंगटी कोतवाली पहुंचा। पुलिस अस्पताल पहुंची। एएसआई पंकज कुमार के बदन पर चढ़ी वर्दी की तपिश के सामने एक पिता की फरियाद जलकर राख हो गई और एक गरीब की लाचारी और बेबसी पर कानून का डंडा यमराज बनकर टूट पड़ा। बीच सड़क पर एएसआई ने एक बेटी के बाप की पिटाई इसलिए कर दी क्योंकि वो बिना मास्क लगाए अस्पताल इलाज करवाने पहुंच गया था।

एएसआई पंकज कुमार की नजर में ये एक संगीन जुर्म था। जिसकी सजा देने के लिए खुद एएसआई न्यायाधीश भी बन गया और फैसला भी सुना दिया। सामंती सोच वाले इस दारोगा की लाठी उस गरीब के शरीर पर अपने निशान छोड़ रही थी और हर निशान पर उस बाप की तरफ से एक ही सवाल किया जा रहा था कि ‘मुझे क्यों मार रहे हो?’

मुझे क्यों मार रहे हो? जी हां यही वो सवाल है जिसे वो गरीब हर बार पूछ रहा था। लेकिन उसे जवाब नहीं मिला। जानते हैं क्यों? जवाब इसलिए नहीं मिला क्योंकि जिस एएसआई पंकज कुमार ने खुद को न्यायाधीश बनाकर एक गरीब को मुजरिम होने की सजा सुनाई थी और अपने उस स्वघोषित फैसले पर अमल कर रहा था वो खुद भी एक गुनहगार था।

ठाकुरगंगटी कोतवाली से अस्पताल पहुंचे एएसआई पंकज कुमार ने खुद भी मास्क नहीं पहना था। यही नहीं उसके साथ आए किसी भी कोतवाल के चेहरे पर मास्क नहीं था। अगर बिना मास्क पहने इलाज कराना ऐसा ही जुर्म है तो फिर ये कहना गलत नहीं होगा कि खाकी में दिख रहा हर कोतवाल आज गुनहगार था। खुद गुनहगार बनकर एक बेगुनाह को सजा देने का ये विधान किस संविधान में लिखा गया है। क्या इस सवाल का जवाब देंगे सामंती सोच के कीचड़ में आकंठ डूबे ये दारोगा बाबू।

ये सच है कोरोना संक्रमण के इस दौर में मास्क पहनना खुद को और दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए जरुरी है। इसे लेकर सरकार की तरफ से गाइडलाइन भी जारी की गई है। लेकिन क्या ये गाइडलाइन केवल आम जनता के लिए है क्या कानून के रखवालों और अधिकारियों के लिए इस गाइडलाइन का पालन करना जरुरी नहीं है? क्या एक बीमार बेटी के पिता ने इतना बड़ा गुनाह कर दिया था जिसकी सजा एक वर्दीधारी ने बीच सड़क इस तरह से दी? क्या पुलिस को ये अधिकार है कि वो जब चाहे जिसे चाहे सरेआम अपने डंडे की मजबूती का एहसास कराता रहे? क्या एक गरीब पर वर्दी का इस तरह से रौब दिखाकर पुलिस आम जनता का विश्वास जीत सकेगी? क्या ठाकुरगंगटी के ASI कानून की दफा धाराओं से ऊपर हो सकता है?

ये वो सवाल हैं जिसका जवाब पूरे पुलिस महकमे के लिए एक यक्ष प्रश्न है। क्योंकि जिस पुलिस-पब्लिक तालमेल की बात आए दिन होते रहती है क्या उस कोशिश को इस तरह की शर्मनाक हरकतों की वजह से ठेंस नहीं पहुंचेगी। आज अगर पुलिस पर आम जनता का विश्वास कम हुआ है तो उसकी एक बड़ी वजह पुलिसकर्मी का इस तरह का बर्ताव भी है।

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