गोड्डा सिविल सर्जन डॉ. बनदेवी झा हुईं सेवानिवृत्त

गोड्डा/झारखंड:  सिविल सर्जन डॉ. बनदेवी झा आज शुक्रवार को सेवानिवृत्त हो गईं। उनकी जगह पर वर्तमान समय में गोड्डा में एसीएमओ के पद पर कार्यरत डॉ. कन्हैया प्रसाद को प्रभारी सिविल सर्जन बनाया गया है। अगस्त 2017 से डॉक्टर बनदेवी झा सिविल सर्जन के पद पर तैनात थीं। इस सम्मान सह विदाई समारोह में उपायुक्त किरण कुमारी पासी, एसडीओ नमन प्रियेश लकड़ा भी मौजूद रहे।

विदाई समारोह में एसडीओ नमन प्रियेश लकड़ा का संबोधन

शुक्रवार को अपने कार्यकाल के आखिरी दिन सिविल सर्जन डॉ. बनदेवी झा ने कहा कि पिछले एक साल का कार्यकाल उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा। लेकिन इस चुनौती से निपटने में उन्हें कार्यालय के हर स्टाफ और दूसरे प्रशासनिक विभागों की तरफ से भरपूर सहयोग मिला।

विदाई समारोह में डीसी किरण कुमारी पासी ने शॉल भेंट की

रांची के RMCH से उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की थी। पिछले 38 सालों से वो सरकारी सेवा में कार्यरत थीं। इस दौरान वो अलग-अलग जगहों पर चिकित्सा पदाधिकारी के तौर पर कार्यरत रहीं। 1981 में उनकी पहली पोस्टिंग भागलपुर जिले के (तब का बिहार) नवगछिया में हुई थी। जिसके बाद उन्होंने साहिबगंज के राजमहल में चिकित्सा पदाधिकारी के तौर पर काम किया। उनकी तीसरी पोस्टिंग देवघर जिले के मधुपुर में थी। जिसके बाद उनकी पोस्टिंग गोड्डा के महागामा में हुई। बाद में गोड्डा सदर अस्पताल में वो कार्यरत रहीं। यहां रहते हुए वो एसीएमओ भी बनीं और अगस्त 2017 में उन्हें गोड्डा का सिविल सर्जन बनाया गया।

15 अगस्त 2018 को बेहतर सेवा के लिए प्रशस्ति पत्र लेते हुए डॉ. बनदेवी झा

उनके इस कार्यकाल के दौरान जिले को कायाकल्प अवार्ड भी मिला। हाल ही में 15 अगस्त के दिन उन्हें विशिष्ट सेवा के लिए प्रशस्ति पत्र भी दिया गया था।

विदाई भाषण की खास बातें…

इस सफर की शुरुआत हुई थी 38 साल पहले और आज, 38 साल बाद ये मुसाफिर उस पड़ाव पर पहुंचा है, जहां से जिंदगी एक नई मोड़ लेती है।… सबसे पहले तो इस विदाई समारोह का इंतजाम करने के लिए आप सभी को धन्यवाद। आप सबों की तरफ से सरकारी सेवा में मेरे इस अंतिम दिन को यादगार बनाने के लिए अपनी तरफ से बेहतरीन कोशिश की गई है।

…मेरे साथ काम करने वाले डॉक्टर हों, कर्मचारी हों, कोई नर्स हों, या अस्पताल की साफ सफाई में लगा कोई स्टाफ हो, सभी की तरफ से मिलने वाली एक सकारात्मक ऊर्जा और सहयोग ने सिविल सर्जन के तौर पर मेरे इस पिछले एक साल के कार्यकाल को एक यादगार बनाया।

सिविल सर्जन के तौर पर कार्यकाल का आखिरी दिन

उन्होंने कहा …किसी भी विभाग में जो अधिकारी होता है वो ट्रेन का इंजन है। और जो साथ काम करने वाले सहयोगी हैं वो इंजन के पीछे चलने वाले डिब्बे हैं। और शहर की जो जनता है वो मुसाफिर है। और सारी व्यवस्था सही सही चले, इसके लिए जरुरी है कि तीनों में तालमेल बनी रहे। क्योंकि टाइमिंग और तालमेल के बिना किसी भी काम को मुकम्मल कर पाना मुश्किल है।….

…इस कार्यकाल के दौरान मेरे साथ जो टीम काम कर रही थी उन्होंने काम के प्रति निष्ठा, लगन और मेहनत में कहीं कोई कमीं नहीं रखी। उनके सहयोग का ही परिणाम है कि इस दौरान कई उपलब्धियां भी हासिल की गईं। उसमें उन सबों का अमूल्य योगदान रहा। ….कायाकल्प अवार्ड और विशिष्ट सेवा के लिए मुझे दिया गया प्रशस्ती पत्र हो, ये सबकुछ, एक इमानदार और कर्मठ टीम के बगैर मुमकिन नहीं हो सकता।…

इस कार्यकाल के दौरान कई बार कड़े फैसले भी लेने पड़े। लेकिन वो समय की मांग और जरुरत थी। हो सकता है कुछ लोगों को नाराजगी भी हुई होगी। लेकिन वो परिस्थिति की मांग थी जिसे टाला नहीं जा सकता था।….

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