गोड्डा: धूमधाम से मनाई गई वीर कुंवर सिंह की जयंती, Video

गोड्डा/झारखंड:  वीर कुंवर सिंह की जयंती जिले में धूमधाम से मनाई गई। इस मौके पर शहर के कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। जयंती के मौके पर कुंवर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद उन्हें याद किया गया। कुंवर सिंह की जीवनी मौजूदा वक्त में भी युवाओं के लिए पथ प्रदर्शक का काम करती है। बिहार के जगदीशपुर में 1778 में कुंवर सिंह का जन्म हुआ था। 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने रीवा के जमींदारों को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाई थी।

25 जुलाई 1857 को जब क्रांतिकारी दानापुर से आरा की तरफ बढ़े तो उसमें बाबू कुंवर सिंह भी सम्मिलित हो गए। उनके विचारों और इरादों से अंग्रेज पहले से परिचित थे। इसलिए उन्हें पटना बुलाया गया ताकि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए। लेकिन कुंवर सिंह अंग्रेजों की चालाकी भांप चुके थे और बीमारी का बहाना बनाकर वो पटना नहीं गए।

1857 में आरा में आंदोलन की कमान कुंवर सिंह  ने संभाल ली और जगदीशपुर अंग्रेजों से मोर्चा लेकर सासाराम और रोहतास में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित कर दी। इसके बाद 500 सैनिकों के साथ वो रीवा पहुंचे और वहां के जमींदारों को अंग्रेजों के खिलाफ एकत्रित किया। वहां से बांदा होते हुए वो काल्पी और फिर कानपुर पहुंचे। इस दौरान तात्या टोपे से उनका संपर्क हो चुका था।

कानपुर में अंग्रेजी सेना पर हमला कर वो आजमगढ़ पहुंचे और वहां सरकारी खजाने पर कब्जा कर अंग्रेजों के खिलाफ छापापार युद्ध जारी रखा। उनकी वीरता के सामने अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। तब कुंवर सिंह की उम्र 80 वर्ष थी।

अंग्रेजों को पीछे धकेलकर वो वापस जगदीशपुर लौट रहे थे। लेकिन गंगा पार करते वक्त अंग्रेजों की एक गोली उनकी बाएं हाथ की कलाई में लग गई। जिसके बाद उन्होंने उस हाथ को ही काट कर गंगा में प्रवाहित कर दिया। 23 अप्रैल 1858 को वो जगदीशपुर पहुंचे। लोगों ने उनका राजतिलक किया। लेकिन हाथ कटने की वजह से उन्हें सेप्टिक हो गया था जिस वजह से 26 अप्रैल 1858 को 1857 की क्रांति के इस महानायक की जीवन लीला समाप्त हो गई।

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