गोड्डा: अडाणी का विरोध करनेवालों की सोच आज बदल चुकी है?

गोड्डा/झारखंड: इस इलाके में जब अडाणी के आगमण की सुगबुगाहट शुरु हुई थी तो कंपनी, जमीन के लिए ग्रामीणों के सामने खड़ी थी। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि ग्रामीणों की एक बड़ी संख्या ने जमीन देने से इनकार कर दिया। मजबूरन कंपनी ने अपनी जमीन की जरुरत को कम कर लिया और पावर प्रोजेक्ट का काम शुरु हुआ। लेकिन एक वक्त में जो गांव कंपनी के विरोध में खड़े थे वहां अब सोच भी बदली है और हालात भी कंपनी के अनुकूल हो चुके हैं। आखिर इतनी बड़ी तब्दीली कैसे आई।

इसी सवाल का जवाब जानने के लिए हमने पेटवी, रंगनिया, बलिया किता और बक्सरा का दौरा किया। जहां ग्रामीणों के बीच पहुंचकर हमने ये जानने की कोशिश की, कि आखिर शुरुआती दिनों में अपनी जमीन को लेकर जो डर लोगों के दिलों में था उसकी वजह क्या थी। और साथ ही हमने ये भी जानने की कोशिश की, कि आज उन ग्रामीणों का क्या सोचना है।

शुरुआत में लोगों में घबराहट या डर इस बात को लेकर थी कि जमीन लेने के बाद कंपनी का उनके प्रति बर्ताव कैसा रहेगा। जो जमीन कंपनी के नाम की जाएगी उसके एवज में जो मुआवजा उन्हें दिया जाएगा क्या वो रैयतों की जरुरतों के मुताबिक होगा। यही वो सवाल थे जिनकी वजह से रैयत असमंजस में थे। पंकज मानते हैं कि शुरुआती दिनों के विरोध के पीछे बिचौलियों की सक्रियता भी एक वजह थी।

हमने पंकज कुमार मंडल, अवधेश कुमार, नागेश्वर कुमार, केदार साह, बेद नारायण साह, सुदीन साह, सोहन साह, निर्भय झा, संतोष झा जैसे ग्रामीणों से जब उनके विरोध और अब रजामंदी के बारे में पूछा तो उन सभी की बातों का निचोड़ यही निकला तो लोगों में असल भ्रम मुआवजे की राशि को लेकर थी। लोग ये सोच रहे थे कि कंपनी जमीन लेने के बाद कहीं अपनी बातों से मुकर तो नहीं जाएगी। लेकिन जब कंपनी ने दूसरे गांव में अपनी जमीन की जरुरत पूरी की और लोगों को मुआवजे के भुगतान भी हुआ तो उनकी सोच भी बदली।

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