उमर अब्दुल्ला ने इसलिए महबूबा मुफ्ती के साथ जाने से किया परहेज

नई दिल्ली:  जम्मू-कश्मीर में तकरीबन तीन साल दो महीने पुरानी महबूबा मुफ्ती की सरकार गिर गई। बीजेपी के समर्थन वापसी के बाद महबूबा ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके बाद अब राज्य में राज्यपाल शासन ही एकमात्र विकल्प बचा है। क्योंकि हर पार्टी ने राज्य में वैकल्पिक सरकार से इनकार कर दिया है। उमर अब्दुल्ला ने पीडीपी को समर्थन देने की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया।

उमर अब्दुल्ला का पीडीपी से गठबंधन ना करने के पीछे कुछ ऐसी वजह है जिसे अगर नजरअंदाज किया जाता है तो नेशनल कांफ्रेंस को बड़ा नुकसान होना तय है। आईये जानते हैं क्या हैं वो वजह जिसके चलते नेशनल कांफ्रेंस जम्मू-कश्मीर में वैकल्पिक सरकार नहीं चाहती।

महबूबा के इस्तीफे के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल एन एन वोहरा से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद उमर ने कहा कि वो पीडीपी को समर्थन नहीं दे रहे हैं और ना ही सरकार बनाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी को सरकार चलाने का जनादेश नहीं मिला है।

बीजेपी ने गठबंधन इसलिए तोड़ा क्योंकि इस गठबंधन के दौरान वहां ज्यादातर वक्त अशांति ही रही। बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद राज्य में हालात और खराब हो गए। यानि इस वक्त जम्मू कश्मीर का ताज एक कांटों का ताज है, और ये सबकुछ जानते अगर उमर अब्दुल्ला पीडीपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाते तो उनसे ज्यादा बड़ा सियासी अनाड़ी और कोई नहीं होता।

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और एनसी परस्पर विरोधी पार्टी है। अब अगर उमर पीडीपी से हाथ मिलाकर सरकार बनाते तो एक तरह से वो पीडीपी की गलतियों को सही होने का सर्टिफिकेट देते। साथ ही ये पीडीपी के सामने सरेंडर होता।

नेशनल कांफ्रेंस यूपीए की पार्टनर है। 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एनसी का समर्थन भी किया था। मौजूदा वक्त में एनसी 2019 के लिए बन रहे महागठबंधन का हिस्सा भी है। अब अगर उमर अब्दुल्ला महबूबा की तरफ हाथ बढ़ाते तो इस महागठबंधन से उनका पत्ता कट सकता था।

जम्मू-कश्मीर में सरकार की मियाद 6 साल की होती है। मार्च 2015 में बीजेपी-पीडीपी की सरकार बनी थी। यानि राज्य में तीन साल तीन महीना बीत चुका है। अब आधे वक्त के लिए सरकार बनाकर नेशनल कांफ्रेंस को कुछ खास हासिल नहीं होता सिवाय आलोचना के।

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