raksha sutra

किसी धार्मिक अनुष्ठान के बाद इस तरह से बांधें रक्षा सूत्र मिलेगा लाभ

किसी धार्मिक अनुष्ठान के बाद इस तरह से बांधें रक्षा सूत्र मिलेगा लाभ

नई दिल्ली:  घर में कोई अनुष्ठान हो या कोई नई शुरुआत हो उसमें कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा पौराणिक काल से ही चली आ रही है। रक्षा सूत्र बांधते तो सभी हैं लेकिन ज्यादातर लोगों को इसे बांधे जाने के असली वजह के बारे में पता नहीं होता या कई लोग ऐसे भी होते हैं जो इसे बांधने के सही तरीके को नहीं जानते। दरअसल कलावा या रक्षा सूत्र बांधने का वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों महत्व है।

मौली का शब्दिक अर्थ होता है सबसे ऊपर। यानि मौली का तात्पर्य सिर से भी है। आमतौर पर इसे हाथ की कलाई पर बांधा जाता है इसलिए इसे कलावा भी कहा जाता है। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध है। मौली कच्चे धागे से बानाई जाती है। इसमें मूलत: तीन धागों का प्रयोग किया जाता है। इन तीनों धागों के तीन रंग होते हैं, लाल, पीला और हरा। लेकिन कई बार इसे पांच धागों से भी बनाय जाता है। और इसके पांचों धागों में पांच तरह के रंग होते हैं। लाल, पीला, हरा, सफेद और नीला। तीन धागों वाले को त्रिदेव और पांच धागों वाले को पंचदेव कहा जाता है।

मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। किसी मन्नत के लिए इसे देवी-देवता के स्थान में भी बांधा जाता है। लेकिन मन्नत पूरी हो जाने के बाद इसे खोल देना चाहिए। मौली का प्रयोग घर में लायी गई नई वस्तु में भी किया जाता है।

मौली को बांधने के नियम भी हैं। इसे पुरुष या अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। जिस हाथ में कलावा बांधा जा रहा हो उसकी मुट्ठी बंद होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर रखा होना चाहिए। मौली को बांधते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसके धागे को केवल तीन बार ही लपेटा जाए।

मौली को जब कलाई पर बांधा जाता है तो उसे उप मणिबंध कहते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं। जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य और जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इनके नाम शिव, विष्णु और ब्रह्मा हैं। इसी तरह से शक्ति, लक्ष्मी और सरस्वती का भी यहां वास रहता है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि रक्षा सूत्र या मौली बांधने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश और तीनों देवियां लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती की कृपा मिलती है।

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