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सरकार! एक छत के लिए रात में जागना और सड़क पर सोना पड़ता है

सरकार! एक छत के लिए रात में जागना और सड़क पर सोना पड़ता है

नई दिल्ली:  दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा मे एक कतार में बनती इमारतों का जंगल दिखाई देता है। ईंट, बालू, सीमेंट, गिट्टी इत्यादि इत्यादि सामानों से तैयार हो रहे इन इमारतों में लोग बसते हैं। अब आप कहेंगे जब इमारत बनी ही नहीं तो लोग कैसे रहने लगे। चलिये मान ली आपकी बात। इन इमारतों में लोग नहीं रहते हैं लोगों के ख्वाब रहते हैं। लोग अलग हैं उनके सपनों की लंबाई- चौड़ाई अलग, उनके ख्वाब की कीमत अलग है लेकिन इतने अलगाव वाले इस ग्रेटर नोएडा में एक चीज समान है। जानते हैं क्या वो चीज है धोखा… जी हां आप बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं उस समान दिखनेवाले चीज का नाम है धोखा।

कोई दिल्ली रहता है, कोई नोएडा रहता है, कोई गाजियाबाद रहता है तो कोई गुड़गांव रहता है। लेकिन इन रहनेवालों को इतनी छोटी चौहद्दी में सीमित मत कीजियेगा क्योंकि यहां जिन चार जगहों का जिक्र किया गया है उनमें रहनेवाले देश के अलग अलग हिस्सों से रहने के लिए यहां आए हैं। कोई काम करता है कोई काम की तलाश करता है। लेकिन यहां पर फिर से एक बात सभी के साथ समान है। क्योंकि ये सभी रात में जागते हैं और जब आखें बोझिल होने लगती हैं तो सड़क पर ही सो जाते हैं।

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जानते हैं इन्हें रात के अंधेरे में इस सड़क पर किसने लाया है। नहीं जानते हैं तो सुन लीजिये। क्योंकि हम बताने में कंजूसी नहीं करते हैं। इन्हें सड़क पर लाया है हमारे ही सिस्टम ने। जिसमें आजतक यही तय नहीं हो सका है कि काम करना कैसे है। सरकार से लेकर अफसरों के पलटन तक को एक ही धुन सवार है कि काम करना है। ऊपर वाले नीचे वाले को कह रहे हैं काम कीजिये, नीचे वाले अपने नीचे वाले को कह रहे हैं काम कीजिये और वो नीचे वाले अपने नीचे वाले को काम करने कह रहे हैं। इस नीचे नीचे के चक्कर में आज वो फ्लैट खरीदार सबसे नीचे जमीन पर आ गए हैं जिन्होंने ग्रेटर नोएडा के आम्रपाली की इन अट्टालिकाओं में अपना आशियाना बनाने के लिए लाखों खर्च किये थे।

इनके पैसे खर्च हो गए, बैंक से निकालकर इन्होंने उन पैसों को बिल्डर की तिजोरी में पहुंचा दिया। इसके बदले में बिल्डर ने वादा किया था कि बस डेढ़ दो साल की बात है आपका अपना घर होगा। वो दो साल 7 साल में बदल गया बिल्डर ने अपने पैसे तो ले लिये लेकिन बदले में घर नहीं दिया। जानते हैं क्यों क्योंकि सिस्टम में उन्हें घर देने से मना कर दिया। बात जरा हैरान कर सकती है। लेकिन यही सच है। सिस्टम ने ही बिल्डर को घर देने से रोक लिया।

वरना क्या मजाल है कि दो कौड़ी का बिल्डर लोकतांत्रिक शक्तियों से लैस सरकार को एक लाश बनाकर रख दे। अखिलेश से लेकर योगी तक की बात कर लेते हैं। केवल सरकार बदली है सड़क पर अपने फ्लैट की मांग करनेवाले ये चेहरे नहीं बदले हैं। अखिलेश के राज में भी ये तख्ती लेकर सड़क पर निकलते थे, बिल्डर के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करते थे, बाउंसर से पिटते थे और घर वापस आ जाते थे। लेकिन जब यादव युग खत्म हुआ और योगी युग का यूपी में उदय हुआ तो उन्हें उम्मीद जगी कि अब कुछ काम होगा। ऐसी उम्मीद केवल इसलिए नहीं जगी थी कि इन्होंने चुनाव में वोट दिया था। इनकी ये उम्मीद इसलिए जगी थी क्योंकि योगी जी डेडलाइन वाली बात करते हैं।

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लेकिन इन बिल्डरों के सामने उनकी डेडलाइन फिक्स ही नहीं हो पा रही है। बिल्डर अपनी जिद पर अड़ा है जाओ जो करना है कर लो। क्योंकि उस बिल्डर को पता है सरकार का कद कितना है। तीन साल के बच्चों से लेकर 30 साल के युवा और 60 साल के बुजुर्ग तक ग्रेटर नोएडा में बिल्डरों के दफ्तरों के सामने इसी कदर सड़क पर सो रहे हैं। यानि 8 स्क्वायर फीट के फ्लैट के लिए तीन पीढ़ी जाग रही है लेकिन इनके आंखों में होनेवाली जलन की परवाह ना तो नीचे वाले अफसर को है और ऊपरवाले की तो बात ही मत कीजिये। क्योंकि ऊपरवाले तक इनके आंखों की जलन की तपिश पहुंच ही नहीं रही है।

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