झारखंड के छिन्नमस्तिका मंदिर में पूजा के बाद भक्त ने दे दी अपनी बलि




रांची/झारखंड: झारखंड में रांची से कुछ दूरी पर बने मां छिन्नमस्तिका मंदिर में एक शख्स ने मंगलवार को सुबह पूजा के बाद अपना गला रेत लिया। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि उसने अपनी बलि दी है। जिस शख्स ने अपना गला रेता उसका नाम संजय नट बताया जा रहा है। पुलिस के मुताबिक उसकी उम्र 45 साल थी। संजय बिहार के बक्सर के बलिहार गांव का रहनेवाला था।

पुलिस के मुताबिक संजय सीआरपीएफ का जवान था और उसकी तैनाती ओडीशा में थी। स्थानीय निवासियों ने संजय को सोमवार को भी मंदिर के आसपास देखा था। मंगलवार को संजय पूरी तैयारी के साथ छिन्नमस्तिका मंदिर में आया था। जिस कटार से उसने अपना गला रेता वो ठीक वैसी ही थी जैसी कि मां छिन्नमस्तिका की मूर्ति में लगाई गई है।

मंगलवार को सुबह संजय ने पहले भैरवी नदी में स्नान किया। उसके बाद उसने मां छिन्नमस्तिका की पूजा की। और मंदिर का परिक्रमा करने लगा। परिक्रमा के दौरान ही वो मंदिर के गेट पर पहुंचा और अपने साथ लाए कटार से अपना गला रेत लिया। जिसके बाद संजय की मौके पर ही मौत हो गई। परिजनों के मुताबिक संजय की मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक थी। वह काफी पूजा पाठ करता था।

इस घटना के बाद मंदिर में भक्तों का प्रवेश रोक दिया गया है। पुलिस इसे आत्महत्या का केस मान रही है। लेकिन अभी ये साफ नहीं हो सका है कि संजय ने ये दुस्साहस क्यों किया। मां छिन्नमस्तिका मंदिर रांची से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है।

छिन्नमस्तिका मंदिर में बिना सिर वाली देवी विराजमान हैं। इसे शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। मां छिन्नमस्तिका मंदिर दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी शक्ति पीठ मानी जाती है। रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर आस्था की धरोहर है। ये मंदिर 6000 साल पुरानी है।

मंदिर के अंदर जो मां काली की प्रतिमा है उसमें उनके दाएं हाथ में तलवार और वाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है। शिलाखंड में मां की तीन आंखें हैं। बायां पैर आगे की तरफ बढ़ाए हुए वह कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां छिन्नमस्तिका का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केश, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्यरुप में हैं। इनके अलग बगल में डाकिनी और शाकिनी हैं। जिन्हें वह रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। इनके गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं।

मां के इस रुप के पीछे एक पौराणिक कथा है। जिसके मुताबिक कहा जाता है कि एक बार मां भवानी अपनी सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद सहेलियों को इतनी भूख लगी कि उनका रंग काला पड़ने लगा। उन्होंने माता से भोजन मांगा। इसपर मां ने थोड़ सब्र करने के लिए कहा। लेकिन वो भूख से बेहाल हो चुकी थीं। तब मां भवानी ने खड्ग से अपना ही सिर काट लिया।

कटा हुआ सिर उनके बाएं हाथ में आ गिरा और खून की तीन धाराएं निकल पड़ीं। जिनमें से दो धाराओं को उन्होंने उन दोनों की तरफ बहा दिया और तीसरे को खुद पीने लगीं। उसी के बाद से मां के इस रुप को छिन्नमस्तिका के नाम से पूजा जाने लगा। नवरात्रि के मौके पर यहां काफी भीड़ होती है। दूर दराज से लोग यहां सिद्धि प्राप्ति के लिए आते हैं। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब मुखी है।

Loading...

Leave a Reply