सुपौल: बिहार की प्रसिद्ध मिठाई खाजा, जिसके बिना विधि-विधान भी पूरा नहीं होता

प्रदीप जैन/सुपौल
सुपौल/बिहार:  अपने नाम के अनुरूप अपनी विशिष्ट पहचान के लिए विख्यात खाजा मिठाई पिपरा की पहचान बन चुका है। नेपाल की सीमा से सटे बिहार के इस कस्बाई बाजार में बिकने वाली यह अनोखी मिठाई सीमाई बंधन को तोड़ता अब देश के अन्य प्रांतों के लोगो में भी पसंद किया जाने लगा है। दिल्ली प्रगति मैदान हो अथवा पटना के गांधी मैदान हर जगह प्रदर्शनी में लोगों ने इसे सराहा। खास कर बिहार के कोने कोने में लगने वाले मेले में भी खाजा ने अपनी छाप छोड़ी है।

अनुमान के मुताबिक बिगत सौ वर्षो के दौरान खाजा के अपने अस्तित्व का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। स्व.गोनी साह ने पिपरा में पहली दुकान दुर्गा मंदिर के निकट लगाई ।शुरुआती वक्त में हाट में खोमचे में बेचना शुरू हुआ। त्रिवेनीगंज प्रखंड के जागुर निवासी गोनी साह पहले त्रिवेनीगंज बाजार में दुकान लगाते थे लेकिन दुकान नहीं चली तो पिपरा को अपना आशियाना बनाया। जहां उनकी बेमिसाल कारीगरी की धूम कम समय में ही चल पड़ी।

पूर्व सरपंच 80 वर्षीय काली नारायण डे बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला तब से पिपरा में खाजा बेचा जाता रहा है। बीते समय में खाजा चार आने किलो बिका करता था वो भी शुद्ध घी से बना खाजा। खाजा मिथिलांचल की महत्वपूर्ण मिष्ठान है। मांगलिक कार्यो में खाजा ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि शादी समारोह में परोसे गए मिठाई के अलग अलग भेरायटी में एक मिठाई खाजा अवश्य शामिल होता है।

गणेश चतुर्थी जिसे बिहार में जिउतिया कहा जाता है बिहार में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्वो में से एक है। इस पर्व में बगैर खाजा के सम्पन्न पर्व के विधि विधान पूरे नही होते। जिले का हृदय स्थली कहा जाने वाला पिपरा बाजार एनएच 327 ई और एनएच 106 के मध्य अवस्थित है तकरीबन 60 से 70 दुकाने मिठाई की है जिनका मुख्य पेशा ही खाजा बेचना है। परिवर्तन के दौर में कई दुकानदारों ने अन्य आधुनिक मिठाई बेचने का कारोबार शुरू किया। लेकिन पहचान बना चुके खाजा मिठाई के आगे किसी मिठाई की बिक्री गति पकड़ नहीं पाई।

आलम यह है कि रोजाना 5 से 10 क्विंटल खाजा की बिक्री होती है। इस व्यवसाय से जुड़े ऐसे हजारों लोग हैं जिनका भरण पोषण इस व्यवसाय से हो रहा है। महंगाई के दौर में जहां अन्य दूध से बने मिठाई ढाई सौ से पांच सौ रुपये प्रति किलो बिकते है वही आज भी खाजा प्रतिस्पर्धा से दूर महज 80 रुपये में उपलब्ध है। अगर शुद्ध घी से बना खाजा लेना हो तो महज 300 रुपये किलो की दर पर खाजा आसानी से मिल जाता है।

त्रिवेनीगंज से निकलकर पिपरा पहुंचे खाजा की नकल हर जगह की गई लेकिन बेमिशाल और कम कीमत का असर कोई नही डाल पाया।दिनोदिन खाजा के फैलते कारोबार ने अब वृहद रूप हासिल कर लिया है। पड़ोसी देश नेपाल सीमा से पटना या दिल्ली जाने वाली बसों में सवार यात्री जरूर यात्रा के दौरान खाजा संदेश के रूप में खरीददारी कर घर ले जाते हैं। स्व. गोनी साह के आविष्कार वाले खाजा को लेकर स्थानीय व्यवसायी चिंतित है दुकानदारों के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर बने पहचान को लेकर सरकार इसमें पहल करे जिससे इलाके की पहचान के साथ साथ लोगो की रोजी रोटी का भी जुगाड़ बना रहे।

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