सुपौल: इस गांव में चमगादड़ किसी भगवान से कम नहीं, पूरा गांव मिलकर करता है उनकी रक्षा

प्रदीप जैन/सुपौल

सुपौल/बिहार:  पशु और पक्षियों से प्रेम की बात कोई नई नहीं है। लेकिन एक ऐसा भी गांव है बिहार के सीमांचल में जहां एक परिवार चमगादड़ पाल रहा है। पूर्वजों द्वारा पाले गए चमगादड़ की संख्या अब इतनी हो गई है कि एक साथ उड़ने पर आसमान में काले बादल की तरह नजर आते हैं। सुपौल जिले के लहरनियाँ गांव स्थित प्रो अजय सिंह आज भी पूर्वजो की इस परंपरा का निर्वाह कर रहे है।लगभग 10 एकड़ जमीन में चमगादड़ के रहने का ठिकाना है जहां चमगादड़ो के लिए इस परिवार ने भारी मात्रा में पेड़ लगा रखे है। जहां इनका बसेरा है। किसी तरह का इन्हें नुकसान नहीं हो इसका विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है।

चोरी छिपे शिकार करने वालों पर गांव के लोगों की नजर रहती है। आमतौर पर दो तरह के चमगादड़ होते हैं। मांसाहारी और फलहारी। मांसाहारी जहां छोटे कद के होते है वहीं लहरनियां में बड़े कद वाले फलहारी चमगादड़ के पीछे जो तर्क दिए गए वो भी काफी दिलचस्प हैं।अजय सिंह बताते है कि किसी सरकारी अफसर की फरमाइश पर उनके परिजन ने बंदूक से शिकार कर चमगादड़ खाने को दिया था। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसकी मौत हो गई। परिवार में ऐसी कई घटनाओं का उन्होंने जिक्र किया। जिससे चमगादड़ के शिकार के बाद कुछ न कुछ अनहोनी हुई।

चमगादड़ पालने वाले इस परिवार के लोग इसे शुभ मानते हैं। वहीं गांव के लोग भी इसकी पुष्टि करते हैं। चोरी छिपे शिकार करने वाले गांव के लोग भी इसकी कहानी से खौफ खाते हैं। हाल की घटना का जिक्र करते ग्रामीण ने बताया कि शिकार करनेवाले ग्रामीण की आंखों की रोशनी चली गई। वहीं वर्ष 2008 में आये कोशी के प्रलयकारी बाढ़ में यह इलाका डूबने से बचा रहा।

किवदंतियों को मानें तो इन चमगादड़ों के रहने से महामारी जैसी बीमारी नहीं फैलती। चमगादड़ की अनोखे शौक को देखने रोजाना हजारों लोग दूर दूर से यहां पहुंचते हैं। परिवार के लोगों की परंपरा अब इनके लिए मुसीबत बनती जा रही है। चमगादड़ का कोई शिकार नहीं कर ले इसके लिए हमेशा चौकसी बरती जाती है । स्थानीय लोगों का भी मानना है कि यह क्षेत्र पक्षियों के लिए अभ्यारण स्थल बने जिससे दुर्लभ प्रजाति को बचाया जा सके।

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