सीमांचल में सरकारी उदासीनता से बांस खेती से किसानों का मोह भंग हो रहा है

प्रियांशु आनंद/पुर्णिया
पुर्णिया/बिहार:  कोसी और सीमांचल के ग्रामीण परिवेश में बांस की खेती और इससे बने सामानों की अहम उपयोगिता है। लेकिन हावी हो रही भौतिक सुख सुविधाएं अपना असर दिखा रही हैं और गांव कसबों में किसान बांस की खेती से विमुख हो रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने व उचित मूल्य नहीं मिलने के कारण किसानों ने बांस की खेती से किनारा कर लिया है। कुछ वर्ष पूर्व तक सरकार द्वारा राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को सरकारी लाभ के साथ साथ बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित भी किया जा रहा था। बाढ़ की विभीषिका झेलने वाला सूबे का उत्तरी बिहार का यह पूरा इलाका पग पग पोखर माछ मखान और पान के अलावा बांस की खेती के लिए भी मशहूर है लेकिन इसे सरकारी उदासीनता ही कहेंगे कि यह पूरा इलाका अब बांस की खेती से दूर हो रहा है।
नहीं मिलती है आर्थिक सुरक्षा की गारंटी
आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं रहने के कारण अब इन इलाकों के किसानों का बांस की खेती से मोहभंग हो रहा है। सहरसा जिले में बैजनाथपुर पेपर मिल के चालू नहीं होने के पीछे भले ही कई राजनीतिक साजिशें हो, लेकिन कागज निर्माण के लिए कच्चा माल मसलन बांस की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होना भी एक बहुत बड़ा कारण है। कोसी और सीमांचल में कागज उद्योग की प्रचुर संभावनाएं हैं। इस उद्योग के लिए वुड पल्प से बेहतर कच्चा माल बांस के पल्प को ही माना जाता है। देश के नामी गिरामी पेपर इंडस्ट्रीज भी कच्चे माल के तौर पर बांस का ही इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं कागज उद्योग के जानकारों का मानना है कि बांस के पल्प से बने कागज न सिर्फ रिसाइकल किए जा सकते हैं बल्कि इसका पर्यावरण पर भी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। कागज की जो लुगदी तैयार होती है उसके लिए बांस से बेहतर कच्चा माल और कोई नहीं हो सकता है।
फ्लॉप हुआ राष्ट्रीय बांस मिशन
बिहार राज्य बांस मिशन वन क्षेत्र एवं गैर वन क्षेत्र के तहत कोसी और सीमांचल के जिलों का चयन किया गया था। लेकिन हकीकत यही रही कि इन दो प्रमंडलों के जिलों में बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए की जा रही प्रशासनिक कवायद नाकाफी साबित हुई। इसका परिणाम यह रहा कि तमाम प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय बांस मिशन फ्लॉप हो गया। दरअसल राष्ट्रीय बांस मिशन कार्यक्रम देशभर में कृषकों के आर्थिक उन्नयन का कारण बना था। लेकिन सबसे अधिक संभावना वाले कोसी और सीमांचल में यह योजना धरातल पर उतरने से पूर्व ही बंद हो गई। जबकि कृषि व जल विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ की विभीषिका रोकने में बांस सबसे उपयोगी साबित हो सकता है। जानकारों का कहना है कि बाढ़ प्रभावित इलाके में बांस के पौधे लगाने से वहां कटाव की संभावना काफी कम हो जाती है। इसलिए तटबंध के अंदर इसका बड़ा फायदा मिल सकता है।
नहीं है कोई नई कार्ययोजना
पुर्णिया में उद्यान विभाग के सहायक निदेशक उपेंद्र कुमार ने जानकारी दी सहायक स्थानीय स्तर पर बांस की कोई नर्सरी नहीं होने के कारण और राष्ट्रीय बांस मिशन के बंद हो जाने के कारण बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए फिलहाल कोई नई योजना नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व इन क्षेत्रों में बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केन एंड बैंबू टेक्नोलॉजी सेंटर (गुवाहाटी) से आए वैज्ञानिकों के दल ने क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को प्रशिक्षण दिया था और वैज्ञानिकों ने कोसी व सीमांचल के मौसम को बांस उत्पादन के लिए उपयुक्त माना था। राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत शुरू की गई ‘बांस घर’ योजना भी बंद हो चुकी है। राष्ट्रीय बांस मिशन योजना के तहत बांस घर को महादलित बस्तियों में प्रायोगिक तौर पर बनाया गया था और बाद में इसे वृहत रूप देने की योजना थी। यह घर भूकंपरोधी होने के साथ साथ पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहद उपयुक्त है।
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