सहरसा: मकई में दाना देखने के लिए तरस गए अन्नदाता

आशीष कुमार झा/ सहरसा

सहरसा/बिहार:  पूर्वी कोसी तटबंध के अंदर किसान खेती अपने तौर तरीके को बदल कर न सिर्फ अपनी रोजी- रोटी चला रहे थे। बल्कि मक्के की खेती के बल पर अपनी जिंदगी संवारते थे।जिन किसानों को अन्नदाता माना जाता है आज उनके अन्न के मोहताज होने की संभावना है।
मकई की खेती ,कोसी की पहचान
एक दशक से मक्के के हब रूप में अपनी पहचान बनाने वाले कोसी इलाके पर इस बार मौसम की मार ने संकट खड़ा कर दिया है। कोसी के किसान मक्का बेचने पूर्णिया के गुलाबबाग मंडी जाते हैं। मक्के के व्यवसाय से जुड़े व्यापारी का कहना उत्पादन प्रभावित होने से मांग पूरी नहीं हो पा रही है। जिस वजह से फसल के मूल्य में भी वृद्धि हुई है। 15 सौ रुपये क्विंटल गुलाबबाग से मक्के की खरीद की जाती थी। जिसे देश के अलावा बांग्लादेश, कनाडा, आस्ट्रेलिया, नेपाल समेत कई देशों में भेजा जाता था।

हमलोग इस इलाके में आकर मक्का खरीदते थे। यहां से करीब डेढ़ लाख क्विंटल मक्के की खरीदारी होती थी। लेकिन इस बार पचास हजार क्विंटल को भी पार करना मुश्किल है। प्रति एकड़ 22 से 24 हजार खर्च करने के बावजूद मौसम की मार के कारण उत्पादन से आय 15 हजार के आंकड़े को पार नहीं कर पाएगा। बकुनियां के किसान दिलीप कुमार यादव बताते हैं कि प्रति एकड़ पांच हजार का बीज ट्रैक्टर से बारह बार जुताई 2000 का मजदूर तीन बार सिंचाई पर छह से सात हजार खर्च किया जाता है। जहां उत्पादन 35 से 40 क्विंटल होना चाहिए। इस बार बाली में दाना नहीं आने के कारण 15 से 20 क्विंटल उत्पादन होने की संभावना है।
देवानंद यादव, हाटी के नवल किशोर राय समेत कई किसानों की खेती से आय के अरमान पर पानी फिर गया है उनका कहना है कि फसल में बाली नहीं आने के वजह से आय तो दूर की बात है।हमारे क़र्ज़ में डूबने तक की संभावना है।

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