सहरसा:चार दशक बाद भी नहीं निकला पेपर मील से धुआं…!

गौतम कुमार/सहरसा
सहरसा/बिहार: साल 2010 में जब दूसरी बार नीतीश सरकार मसलन एनडीए 2 बनी तो मंत्रीमंडल में उद्योग मंत्री रहीं रेणु कुशवाहा ने कोसी महोत्सव के दरम्यान बड़े ही जोर शोर से बैजनाथपुर स्थित पेपर मिल से धुआं निकल जाने की घोषणा की थी लेकिन पांच वर्ष से लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

हालांकि यह सिलसिला पिछले 41 वर्षों से जारी है और तमाम सरकारें महज आश्वासन के दम पर ही कोसीवासियों को छलती आ रही हैं। 1974 में शिलान्यास हुए इस पेपर मिल निर्माण मद में उस वक्त 95 लाख रूपये आवंटित किए गए ताकि ससमय निर्माण कार्य पूरा कर पांच टन कागज का निर्माण प्रतिदिन किया जा सके।

भवन निर्माण से लेकर बेशकीमती मशीनों की खरीददारी तक हो गई लेकिन चार दशक बीत जाने के बाद भी मिल चालू होने का सपना पूरा नहीं हो सका है। हालांकि बिहार में लालू राबड़ी की सरकार के बाद 2005 में नीतीश सरकार बनने के बाद आशा जगी थी कि पेपर मिल से धुआं निकलेगा लेकिन 2015 में नीतीश सरकार बनने के बाद भी सपना साकार होता नजर नहीं आ रहा है।

अनुमानित करोड़ों रूपये की मशीनें जंग के हवाले हो चुकी हैं और लंबे चौड़े क्षेत्र में बने भवन के शीशे और खिड़कियां पूरी तरह से टूट चुकी हैं। गौरतलब है कि बिहार पेपर मिल्स लिमिटेड, बैजनाथपुर में तत्काल 16 कर्मियों की तैनाती की गई थी जिनमें से पांच कर्मचारी बिहार सरकार अथवा दूसरे विभागों में पूर्व से कार्यरत थे और महज 11 कर्मचारी ही पूर्णतः बिहार पेपर मिल पर आश्रित थे।

इन कर्मियों को वर्षों से वेतन नहीं मिलने के कारण इनके समक्ष भी भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई। लंबा वक्त बीत जाने के बाद इसे दो चरणों में चालू करने का निर्णय लिया गया। प्रथम चरण में अनुमानित लागत 05 करोड़ 47 लाख 55 हजार रूपये आंकी गई और निर्माण कार्य 1987 तक संपन्न करने का निर्णय लिया गया। पुआल, रद्दी कागज आदि पदार्थों का कच्चे माल के तौर पर उपयोग न कर आयातित पल्स का उपयोग करने का निर्णय लिया गया।

जबकि दूसरे चरण में स्थानीय कच्चे माल मसलन बांस, पुआल आदि को बतौर कच्चा माल उपयोग करने का निर्णय लिया गया। निर्धारित समय पर निर्माण कार्य पूरा नहीं होने पर उक्त निर्णय को संशोधित करते हुए निर्णय लिया गया कि प्रथम चरण में कच्चे माल के तौर पर 50 प्रतिषत आयातित पल्स का उपयोग किया जाएगा। समयावधि के साथ ही 1987 में इसकी अनुमानित लागत सात करोड़ 22 लाख रूपये, 1991 में 10 करोड़ 82 लाख रूपये, 1993-94 में 12 करोड़ रूपये और वर्तमान में यह आंकड़ा कितना होगा स्वतः अनुमान लगाया जा सकता है।

करोड़ों की राशि खर्चने के बाद भी सरकारी उपेक्षा के कारण इस पेपर मिल से धुआं नहीं निकल पाया है। बाद में बिहार सरकार ने वित्तीय अभाव का बहाना बनाकर इसे बंद करने की गुहार हाईकोर्ट से लगाई थी। इसके खिलाफ बिहार पेपर मिल्स लिमिटेड के कर्मियों ने याचिका भी दायर की थी। इसी रस्साकसी की वजह से मिल का षेश निर्माण कार्य ठप हो गया और अब तो पूरी तरह से यह मिल अवशेष में तब्दील होने की कगार पर है।

मशीनों में जहां जंग लग चुका है वहीं पूरा 56 एकड़ का परिसर चारागाह में बदल चुका है। इसी बीच मिल की संपत्ति के आंकलन हेतु परिमापक को आदेश दिया गया। बाद में पटना हाईकोर्ट ने बिहार पेपर मिल्स लिमिटेड बैजनाथपुर के परिमापन को निरस्त करते हुए परिमापक को बिहार पेपर मिल्स की संपत्ति प्रबंधन को वापस किए जाने का आदेष दिया। साथ ही बिहार सरकार को हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस परियोजना को अविलंब चालू कराया जाए। बावजूद इसके अभी तक इस परियोजना हेतु सूबाई सरकार गंभीर नहीं है।

पेपर मिल चालू कराने को ले स्थानीय लोगों द्वारा धरना प्रदर्शन भी किया गया। एआईएसएफ के संतोश कुमार कहते हैं कि इस बाबत उन्होंने कई बार स्थानीय लोगों की मदद से धरना प्रदर्शन कर तात्कालीन उद्योग मंत्री बिहार सरकार डाॅ रविंद्र चरण यादव का घेराव भी किया था, मंत्री जी महज आश्वासन तो परोसे लेकिन नतीजा सिफर रहा।

…कहते हैं सांसद : स्थानीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव कहते हैं कि उन्होंने कई बार इस मुद्दे को संसद भवन में उठाया और बिहार सरकार से भी इस दिषा में सार्थक कदम उठाने की अपील की है लेकिन अब तक सरकार गंभीर नहीं है। श्री यादव कहते हैं कि कोसी क्षेत्र का विकास ही उनका लक्ष्य है और हर हाल में पेपर मिल को चालू कराया जाएगा।

(Visited 5 times, 1 visits today)
loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *