सहरसा: पुराने तेवर हासिल करने के लिए बिहार पीपुल्स पार्टी ने कसी कमर, Video

सहरसा/बिहार:  90 के दशक में बिहार में अपना सियासी दबदबा रखने वाली आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपुल्स पार्टी की धार 21 सदीं में कुंद पड़ गई। लेकिन पार्टी को दोबारा संजीवनी देने की कोशिश खत्म नहीं हुई। पार्टी को दोबारा से पुराने तेवर में बिहार की धरती पर वापस लाने के मकसद से पार्टी के पुराने पदाधिकारी और कार्यकर्ता जिनमें युवाओं की भरमार थी सभी ने मिलकर बुधवार को एक बैठक की।

इस बैठक का मकसद जेल में बंद अपने नेता आनंद मोहन से मिलकर पार्टी के लिए आगे की रणनीति तय करना था। ताकि दोबारा से पार्टी को इस हालत में लाया जा सके कि वो दूसरी सियासी पार्टियों को चुनौती देने की हालत में हो।

इस मौके पर बिपीपा की युवा इकाई के पूर्व अध्यक्ष कुलानंद यादव ‘अकेला’ ने कहा 90 के दशक में बिपीपा एक धारदार विपक्ष की भूमिका में अवतरित हुई थी ।जिसकी मुद्दा आधारित जमीनी लड़ाई को लोग आज भी गंभीरता से याद करते हैं ।पार्टी का यह नारा – ‘हमारा लड़ना जिन्दाबाद , हमारा मरना जिन्दाबाद’ खुद में बहुत कुछ बयां करता है । आज जब शासक वर्ग सत्ता के दर्प में मदहोश है और विपक्ष हताशा में बेहोश तो बिपीपा जैसी जुझारू पार्टी की जरूरत आमजन शिद्दत से महसूस करते हैं । ऐसे में सहरसा के युवाओं का प्रयास अभिनंदनीय है ।

अकेला ने आगे कहा कि पुनर्गठन की दिशा में विस्तृत बातचीत हेतु वे शीघ्र आनंद मोहन जी से मिलकर अगले माह अगली तिथि का निर्धारण करेंगे तथा झारखंड और बिहार सहित देश भर में फैले आनंद समर्थकों की पटना में बैठक की जाएगी।

पार्टी के पूर्व महासचिव श्री एस० के० ‘विमल’ ने कहा हम लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाते थे ।आज पार्टियां संघर्ष करती नहीं ,संघर्ष की औपचारिकता निभाती हैं। ऐसे में बिपीपा का पुनर्गठन वक्त की मांग है। उन्होंने आगे कहा कि – हमारी राजनीति अर्थ और पद के लिए नहीं सेवा और संघर्ष के लिए है । आज की बैठक बिपीपा की पुनर्गठन की दिशा में “माइल स्टोन” साबित होगा ।

पार्टी के पूर्व प्रान्तीय सचिव मो. फैयाज आलम ने अपने संबोधन में बताया कि बिपीपा ने अपनी विचारधारा और पार्टी चरित्र से न कभी समझौता किया है और न करेगी । विधायक, सांसद वही बनेंगे जो पार्टी बनाएगा ।

इं. रमेश सिंह कहा कभी बि पी पा और आनंद मोहन जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि वर्ष91में मधेपुरा और वर्ष1994में वैशाली संसदीय उपचुनाव में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां कहीं खड़ी नजर नहीं आतीं थीं और उनकी यही लोकप्रियता शातिर राजनीति की शिकार बनीं ।हमें फिर से एक बार बिपीपा को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाना है ।

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