पूर्णिया:मधुश्रावणी में महिलाएं बनती हैं पुरोहित… 

प्रियांशु आनंद/ पूर्णिया
पूर्णिया/बिहार : पग पग पोखर, माछ मखान के लिए प्रसिद्ध मिथिला की प्राचीन जीवन पद्धति पूर्ण वैज्ञानिक है। यहां के पर्व त्योहारों का खासा वैज्ञानिक सरोकार है। प्रत्येक उत्सव में कुछ संदेश। कहीं प्राकृतिक प्रकोप से बचाव का संदेश देता श्रावण महीने की पंचमी पर नाग पंचमी हो या फिर नवविवाहितों का लोक पर्व मधुश्रावणी।

श्रावण कृश्ण पंचमी से शुरू मधुश्रावणी मिथिलांचल का इकलौता ऐसा लोकपर्व है जिसमें पुरोहित महिला ही होती हैं। देश के किसी भी इलाके में शायद ही किसी पूजन का पौरोहित्य महिला करती हों। मधुश्रावणी में व्रतियों को महिला पंडित न सिर्फ पूजा कराती हैं बल्कि कथा वाचन भी करती हैं। इन्हें महिलाएं पंडित जी कहकर बुलाती भी हैं।

वैसे समय के साथ इन पंडित की खोज भी मुश्किल होती जा रही है। महिलाओं का इस पुरोहित्व से मनमोह कमतर होता जा रहा है। ऐसे में जो महिलाएं इस लोकपर्व को जिंदा रखने की जद्दोजहद में हैं उनकी पूछ जरूर मधुश्रावणी षुरू होते ही बढ़ जाती हैं। व्रतियां पंडितजी को पूजन के लिए न केवल तय समझौता करती हैं बल्कि इसके लिए उन्हें दक्षिणा भी देती हैं। यह राशि लड़कों के ससुराल से आती हैं। पंडितजी को वस्त्र व दक्षिणा देकर व्रती विधि विधान, परंपरानुसार अपना पंद्रह दिनी व्रत मनाती हैं। मिथिला में नवविवाहितों के लिए यह विशेष पर्व है।

इस वर्ष जिनकी शादी हुई है वे इस पर्व को पंद्रह दिनों तक उपवास रखकर मनाती हैं। दिन में फलाहार के बाद रात में ससुराल से आए अन्न से तैयार अरबा भोजन ग्रहण करतीं हैं। वहीं शाम ढलते ही नयी दुल्हन की तरह सज संवरकर, नए परिधान धारण किए, नख सिख श्रृंगार कर घरों से सखियों संग हंसी ठिठोली करती हर दिन डाला लेकर निकलती हैं।

वहीं पंडित जी की कथा मनोयोग से सुनना नहीं भूलती। शाम होते ही आजकल मिथिलांचल का हर कोना शिव नचारी व विद्यापति के गीतों से गूंजायमान है। मान्यतानुसार, पूर्व समापन दिन नवविवाहिता के पति फिर से सिंदूरदान करते हैं और विवाहिता के पैर में टेमी दागते हैं।

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