सुनो ! मैं पूर्णिया का इंदिरा गांधी स्टेडियम बोल रहा हूं

नीरज झा/ पूर्णिया
पूर्णिया/बिहार:  मैं इंदिरा गांधी स्टेडिम हूं। मुझे क्रिकेट ग्राउंड का हैसियत प्राप्त हुआ था। बडे़ अरमान थे कि मेरे गोद में खेल कर क्रिकेटर एक दिन पूर्णिया का नाम रौशन करेंगे। मेरी स्थापना 13 जनवरी 1989 को तत्कालिन जिलाधिकारी आरएस शर्मा ने करवाया था। लेकिन स्थापना के 30 वर्षों के बाद भी मैनें तीन खिलाड़ी भी राज्य स्तरीय तक के नहीं दिए। मुझे इस बात की बड़ी पीड़ा होती है। हां लेकिन इन 30 वर्षों मैं कई सरकारी कार्यक्रमों का गवाह बना।
इन कार्यक्रमों में तो मुझे बड़ी धूमधाम से सजाया जाता है, बड़ी-बड़ी लाईटे लगायी जाती है। लेकिन खेल को लेकर आज तक एक बल्ब भी नहीं लगाया गया है। मुझे गर्व था कि मै पूरे उत्तर बिहार का एक मात्र क्रिकेट स्टेडियम हूं। लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो मुझे रोना भी आता है और हंसी भी आती है। हंसी इस बात की आती है कि आज मुझे फिर से सजाया जा रहा है क्योंकि आज मैं फिर एक राजनीतिक शख्सियत के आगमन का गवाह बनने जा रहा हूं।
मेरे ग्राउंड में दो-दो हेलिपेड बनाए जा रहे हैं। ताकि मैं किसी बड़े नेता का स्वागत सम्मान करुं। लेकिन अगर वही हेलिपेड से अगर कोई क्रिकेट का सितार उतरता तो मेरा सीना गदगद हो जाता है। लेकिन अभी तक ऐसा संभव नहीं हो पाया। मेरे परिसर में हर तरफ गंदगी ही गंदगी फैली हुई है। जहां देखो लोग पेशाब कर मेरे आंगन को गंदा कर रहे है। जिस फिल्ड और पिच में हरे-हरे घास होने चाहिए थे, आज वहा हर तरफ गढ्ढा ही गढ्ढा नजर आता है।
जिस मैदान में चौका, छक्का, आउट की गूंज होनी चाहिए आज वहां गाड़ियों की गरगराहट, नेताओं का भाषण व अन्य चीजों की आवाजें गुंजती है। बहुत दुःख होता है। मेरी हैसियत भारत के अन्य क्रिकेट स्टेडियम से कम है क्या, क्या नहीं है मेरे पास। सिर्फ और सिर्फ इच्छा शक्ति। सुना है आज फिर बिहार के विकास पुरुष आए है मेरी आंगन में।
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