पूर्णिया: अध्यात्म की दुनिया में गंधर्व को मिला ‘ईश ज्योति’ सम्मान

प्रियांशु आनंद/पूर्णिया

पूर्णिया/बिहार:  जिले में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। चाहे शिक्षा जगत हो, खेल का मैदान हो या फिर अध्यात्म की दुनिया। हर तरफ यहां के युवाओं ने लोहा मनवाया है। इसी क्रम में बता दें कि जिले के धमदाहा निवासी गंधर्व आनंद ने भौतिक दुनिया से दूर अध्यात्म की दुनिया को ही अपनी जिंदगी बना ली है। विशेष बातचीत के क्रम में गंधर्व आनंद कहते हैं कि आज युवाओं के बीच आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव का ही नतीजा है कि उन्हें भटकाव के रास्ते पर चलना पड़ता है। इस भटकाव से बचने के लिए उन्हें अध्यात्म की शरण में आना पड़ेगा।

गंधर्व ने कहा लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति को जानना पड़ेगा तब ही इस समस्या का समाधान निकल सकता है। उन्होंने कहा कि आज युवा शरीर और संसार को ही अपना सबकुछ मान बैठे हैं जबकि यह तो सिर्फ लौकिक है बल्कि पारलौकिक दुनिया को भी समझना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि जीवात्मा ही अध्यात्म है और शांति की प्राप्ति के लिए हमें अध्यात्म की शरण में आना ही होगा। उन्होंने कहा कि आत्मा में जो अध्यास हो वही अध्यात्म है।

मिल चुके हैं कई सम्मान
सिविल सर्विसेज की तैयारी में जुटे गंधर्व आनंद कहते हैं कि आज युवा संस्कृत भाषा को सीमित वर्ग के लोगों की भाषा समझते हैं। जबकि संस्कृत का ज्ञान हुए बगैर सनातन संस्कृति को समझ पाना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि संस्कृत और हमारी संस्कृति में बहुत समानता है क्योंकि यही एकमात्र भाषा है जिसे देवभाषा की संज्ञा मिली है और इसे जानने का प्रयास जरूर करना चाहिए। बता दें कि गत दिनों नई दिल्ली में एक सम्मान समारोह सह पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान गंधर्व आनंद को ईश ज्योति मार्तंड सम्मान से नवाजा गया।

इस मौके पर साहित्यिक व आध्यात्मिक दुनिया के कई दिग्गज मौजूद रहे। अनुराधा प्रकाशन की ओर से उन्हें साहित्य श्री, अध्यात्म वैभव के सम्मान से सम्मानित किया गया। जबकि सीता फिल्म की ओर से मानवता रत्न, अध्यात्म गौरव के अलावे चयन समिति की ओर से ईश ज्योति मार्तंड से विभूषित किया जा चुका है।

त्रिगुणात्मक कर्ता को समझने की है जरूरत
गंधर्व आनंद त्रिगुणात्मक कर्ता के बारे विस्तार से चर्चा करते हुए कहते हैं कि हमारे अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण विद्यमान है। जरूरत इस बात की है कि हम किसे अंगीकार अौर आत्मसात करते हैं। समाज में सतोगुण के अभाव के कारण ही विद्वेष और ईर्ष्याभाव पनप रहा है। भौतिक सुख सुविधा के चक्कर में लोग महत्वाकांक्षी हो रहे हैं और रजोगुण की ओर प्रवृत्त होते हैं और अंतत: वे तमोगुण की ओर प्रवृत्त होते हैं जिससे समाज प्रदूषित होता है। हमें सतत प्रयास करना चाहिए कि हम हर हाल में सतोगुण की ओर ही प्रवृत्त हों। इसे आत्मसात करने के बाद ही हमारे अंदर सदविचारों का संचार होता है और इसी के माध्यम से स्वस्थ व स्वच्छ समाज की परिकल्पना की जा सकती है।

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