पूर्णिया में मखाना की खेती से किसानों की आर्थिक सेहत में होगा सुधार

रिपोर्ट- कुमार गौरव 

पूर्णिया/बिहार : मखाना के जननद्रव्यों की खोज, संग्रहण, मूल्यांकन एवं संरक्षण के लिए खोजी यात्रा 19 से 27 अगस्त 2017 तक की गई थी। जिसमें भोला पासवान शस्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णिया, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी। जिसमें विशेषज्ञ की टीम के द्वारा मखाना की आनुवंशिक विविधता का अध्ययन करने के लिए नमूने का संग्रहण किया गया और भविष्य में बेहतर पैदावार व गुणवत्तापूर्ण बीजोपचार के परिणाम सामने आ सकते हैं। प्रति वर्ष कोसी नदी में बाढ़ आने से लाखों जनजीवन तबाह होता है। हजारों गांव जलप्रलय में प्रवाहित हो जाते हैं। कोसी नदी की तलहट्टी में बालू का जमाव होते रहने से कोसी नदी की जलधारा उथली हो जाने पर तटबंधों की मरम्मत के साथ साथ तटबंधों की ऊंचाई को भी बढ़ाया जाता रहा है। जिस कारण कोसी तटबंध से सटे किसानों की खेती योग्य जमीन कोसी नदी की तलहट्टी एवं तटबंधों में लगभग 20 से 25 फीट नीचे हो गई। फलस्वरूप बाढ़ के समय पानी सीपेज कर किसानों के खेती योग्य जमीन में जलजमाव की स्थिति हो जाती है। सालों भर जलजमाव की स्थिति होने के कारण जलीय खरपतवार विशेष रूप से जलकुंभी आच्छादित हो जाने के कारण लाखों हेक्टेयर खेती योग्य भूमि बेकार जलाशय में परिवर्तित हो जाती है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय पूर्णिया एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, एनबीपीजीआर, नई दिल्ली का संयुक्त प्रयास जारी है। कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ राजेश कुमार कहते हैं कि इन क्षेत्रों में मखाना व मछली उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। वैश्वीकरण के इस युग में विश्व के किसी भी कोने में उपलब्ध कोई गुणवत्तापूर्ण उत्पाद या उपयोगी उपागम अधिक समय तक लोगों की नजरों से ओझल नहीं रह सकता।

बेहद उपयोगी है मखाना

प्राचार्य बताते हैं कि उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र के जलाशयों में उपजने वाले मखाना को सेहत के लिहाज से बेहतर माना गया है। जिसके खाद्य एवं औषधीय गुणों पर भारत सहित जापान, चीन एवं कोरिया जैसे देशों में शोधकार्य िनरंतर हो रहे हैं।  उत्तम गुणवत्ता वाले प्रोटीन एवं स्टार्च के कारण मखाना एक उत्तम खाद्य पदार्थ है एवं कई रोगों में लाभकारी होने के कारण इसे एक ‘खाद्यौषधि’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। वसा की नगण्य मात्रा के कारण् इसे मोटापा से ग्रस्त लोगों के लिए उपयुक्त आहार बनती है और विकसित देशों में इसके निर्यात की भी संभावना बढ़ती है। इसके अतिरिक्त मखाना का लावा एवं इसके विभिन्न भागों में सूक्ष्म पोषक तत्वों एवं जैव रसायनों की उपस्थिति के कारण इसे आयुर्वेद, यूनानी एवं अन्य देशों की देशज चिकित्सा पद्धतियों में स्थान मिला हुआ है। देश में मखाने की प्राकृतिक आबादी पश्चिमी हिमालय स्थित कश्मीर की शीत कटिबंधीय झीलों से लेकर पूर्वोत्तर हिमालय में मणिपुर की लोकतक झील तक फैली हुई है।

खोजी यात्रा में मखाना की आनुवंशिक विविधता का अध्ययन करने के लिए 115 से लेकर 125 मीटर समुद्र तल की ऊंचाई से लिए गए नमूने

विशेषज्ञ की टीम ने किया था दौरा 

खोजी यात्रा के दौरान डॉ सतीश कुमार यादव, प्रधान वैज्ञानिक, एनबीपीजीआर, नई दिल्ली तथा डॉ अनिल कुमार, प्रधान अन्वेषक, मखाना अनुसंधान परियोजना, भोला पासवान शस्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णिया की टीम के द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर और कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, अररिया और किशनगंज का भी दौरा किया गया था। साथ ही किसानों को मखाना उत्पादन की नई तकनीक की जानकारी भी दी गई। यात्रा के दौरान विशेषज्ञ की टीम के द्वारा मखाना की आनुवंशिक विविधता का अध्ययन करने के लिए नमूने 115 मीटर समुद्री तल से लेकर 125 मीटर समुद्र तल की ऊंचाई से एकत्र किए गए। डॉ सतीश कुमार यादव ने कहा कि बिहार एवं भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में बेकार पड़े जलजमाव वाले क्षेत्रों की समग्र उचित विकास एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए मखाना उत्पादन तकनीक एक बेहतर विकल्प है। मखाना सह मत्स्यपालन तकनीक द्वारा कम लागत एवं कम समय में प्रति हेक्टेयर लाखों रूपए के लाभ को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली के अन्य संबंधित संस्थानों को आगे बढ़कर बिहार कृषि विश्ववि़द्यालय, सबौर के साथ मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है। मखाना जैसे कैश क्रॉप को बढ़ावा देने के लिए एक सम्मिलित वृहत परियोजना बनाकर कार्य करना, भविष्य में जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष में लघु एवं सीमांत किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित होगा।

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