पुर्णिया: कृषि महाविद्यालय में प्रशि़क्षण कार्यक्रम, मखाना और मछली से हो सकते हैं मालामाल

प्रियांशु आनंद/पुर्णिया

पुर्णिया/बिहार:  पुर्णिया के भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के द्वारा दो दिवसीय बामेती पटना,  बिहार द्वारा दो दिवसीय प्रशि़क्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें तालाब पद्धति मखाना -सह- मत्स्यपालन तकनीक के बारे में जानकारी दी गई। आयोजन के दूसरे दिन सभी प्रशिक्षणर्थियों को महाविद्यालय में चल रहे मखाना अनुसंधान प्रक्षेत्र का भ्रमण करा कर विस्तृत प्रायोगिक जानकारी दी गई।  तकनीकी सत्र के दूसरे दिन श्री आर के जलज विशेषज्ञ (मत्स्य), कृषि विज्ञान केन्द्र, अररिया ने मखाना-सह- मत्स्य पालन हेतु तालाब का प्रबंधन, संचय पूर्व प्रबंधन, संचय, संचय बाद प्रबंधन,  मछली के विभिन्न प्रजातियों का चयन तथा मछली के पोषक तत्वों, मछलियों में लगनेवाले बीमारी के बचाव एवं उपचार आदि के प्रबंधन विषय पर विस्तृत जानकारी दिए।

बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्य रुप से कृषि, पशुपालन एवं मत्स्यपालन पर आधारित है। इस राज्य में मत्स्य पालन, पोषण सुरक्षा एवं रोजगार हेतू वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अतिमहत्वपुर्ण है। बिहार में बहुत बड़ी जनसंख्या रोजगार हेतु मछली उत्पादन पर निर्भर करती है। बिहार  में 3200 किलोमीटर नदी, 1 लाख हेक्टेयर चैर एवं आर्द्रभूमी, 9000 हेक्टेयर माॅन, 7200हेक्टेयर जलाषय एवं 93296 हेक्टेयर तालाब मौजूद हैं। बहुतायात में मात्स्यिकि संसाधन बिहार में रहते हुए भी यहां मांग से बेहद कम मछली उत्पादन होता है।

 

मुख्यतः बिहार राज्य के मीठे जलश्रोतों में कतला, रोहू, मृगल, ग्रास कार्प, काॅमन कार्प, सिल्वर कार्प एवं बिग हेड कार्प प्रजाति की मछलियां पाली जाती हैं। देशी मांगुर मछली बिहार राज्य की राजकीय मछली हैं। बिहार राज्य में ब्लैक कार्प, पंगाास, सिंघी, तिलापिया, रुपचंदा इत्यादि मछलियों का पालन भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

श्री एस0 पी0 सिन्हा सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान) ने मखाना खेत में खरपतवार का प्रबंधन के साथ-साथ समसामयिक विषय पर विशेष जानकारी दी।  श्रीमति अनुपम कुमारी, सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक (पादप रोग विज्ञान) ने  मखाना-सह- मत्स्य पालन, तालाब में लगने वाले रोग से बचाव हेतु कहा कि एन0 एस0 के0 ई0  (नीम का तेल) 1500 पी0पी0एम0 05 से 07 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से मछली को कोई नुकसान नहीं होता है। साथ ही साथ मखाना पौधों को रोग से बचाव होता है।

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