पूर्णिया: किसानों ने मक्का प्रोसेसिंग प्लांट बनाने की मांग की

प्रियांशु आनंद/पूर्णिया
कसबा/बिहार:  कसबा वासियों के लिए मक्के की खेती आन बान साबित हो रही है। वैसे कसबा की सोना उगलती धरती पर गेहूं हो या धान, मक्का हो या आलू, केला हो या जूट, मिर्च हो या तम्बाकू, दलहन हो या तेलहन सभी फसलें देखते ही देखते लहलहाने लगती है। यहां के मेहनतकश किसान दो तीन दशक पूर्व मिर्च, तंबाकू, जूट और सबसे अधिक आलू की खेती में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। बदलते परिवेश में ये किसान परंपरागत कृषि को छोड़ धान और गेहूं के अलावे आलू, केला की खेती पर ज्यादा जोर देने लगे।
इसकी खेती से किसान काफी लाभान्वित भी हुए। आलू की खेती में अधिक पूंजी के साथ साथ बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता होती है। मजदूरों की किल्लत के कारण आलू की खेती से किसानों का मोहभंग होने लगा। नतीजतन क्षेत्र में आलू की खेती काफी प्रभावित हुई। वहीं क्षेत्र के नदी व नाले सूख जाने के कारण किसानों ने जूट की खेती से भी तौबा कर ली।
जहां तक धान, गेहूं जैसी पंरपरागत खेती का सवाल है किसान अपने खाने पीने भर उत्पादन करते हैं। विगत लगभग डेढ़ दशक से यहां के प्रगतिशील किसान वैज्ञानिक ढंग से मक्के की खेती बढ़ चढ़कर रहे हैं। आलम यह है कि संपूर्ण क्षेत्र में अधिकांश भूभाग पर मक्के की खेती की जा रही है। यहां के किसान हरियाणा और पंजाब के किसानों को काफी पीछे छोड़ चुके है।
सच पूछिए तो यहां प्रति एकड़ 45 से 50 क्विंटल मक्के की खेती करते हैं। मक्के की खेती से किसानों की आर्थिक स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है। क्षेत्रवासियों के जीवन स्तर में भी काफी बदलाव आया है। जरूरत है मेहनतकश इन किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य दिलाने की। प्रगतिशील किसान कहते हैं कि क्षेत्र में यदि मक्का प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना हो जाती है तो न केवल किसानों को व्यापक लाभ मिलेगा बल्कि क्षेत्र का कायाकल्प भी हो जाएगा। बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार के अवसर मिल सकेंगे। इतना ही नहीं क्षेत्र से मजूदरों के अन्य प्रदेशों में पलायन पर भी रोक लगना मुमकिन हो पाएगा। क्षेत्र के प्रगतिशील किसान कम से कम प्रखंड मुख्यालय में मक्का प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना किए जाने की मांग कर रहे हैं।
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