अररिया लोकसभा उपचुनाव तेजस्वी से लेकर नीतीश तक की प्रतिष्ठा का सवाल

नीरज झा/अररिया

अररिया/बिहार: अररिया लोकसभा उप चुनाव की सरगर्मी ये बताने के लिए काफी है कि बिहार की सियासत में ये उप चुनाव आगे चलकर मील का पत्थर साबित हो सकता है। ये केवल एक लोकसभा सीट का चुनाव नहीं है बल्कि बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी के भविष्य की सियासत की दशा और दिशा तय करनेवाला चुनाव है। ये चुनाव अहम इसलिए हो गया है क्योंकि लालू के जेल जाने के बाद और पार्टी में तेजस्वी यादव के सक्रिय होने के बाद  ये उनका पहला चुनाव है तो वहीं महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में शामिल होने के बाद बिहार के सीएम नीतीश कुमार के लिए भी पहला चुनाव है।

एक तरफ सियासत का पुराना तजुर्बा लेकर सीएम नीतीश कुमार अररिया लोकसभा उपचुनाव जीतकर एनडीए में शामिल होने की अपनी सार्थकता सिद्ध करना चाहते हैं। तो तेजस्वी इस मैदान को जीतकर सियासत और  बिहार की जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता का सर्टिफिकेट हासिल करने की कोशिश में हैं। यही वजह है कि अररिया पर दोनों तरफ से दावेदारी में कोई कोस कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

आरजेडी ने अररिया से मो. तसलिमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम को उम्मीदवार बनाया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनके साथ जनता की सहानुभूति जुड़ी होगी। लेकिन केवल सहानुभूति के सहारे जीत नहीं मिल सकती। अररिया से अपनी कामयाबी का सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए तेजस्वी को लालू की सोशल इंजीनियरिंग यानि एमवाई फॉर्मूले को प्रभावी तरीके से लागू करना होगा। इसी एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे लालू ने बिहार की सियासत में शिखर तक का सफर तय किया था।

आज आरजेडी का विस्तार जरूर हो गया है लेकिन पार्टी के कर्णधार बने तेजस्वी आज उसी जगह पर खड़े हैं जहां आज से तकरीबन ढाई दशक पहले लालू खड़े थे। और बिहार की राजनीति में अपना प्रभावी दखल कायम करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे।

दूसरी तरफ एनडीए में शामिल हो चुके सीएम नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू है। जो अपनी मित्र पार्टी बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह को अपना समर्थन दे रही है। यहां पर वोटों के ध्रुवीकरण की बात भी सामने आ रही है। जानकार बता रहे हैं कि बीजेपी अररिया की लड़ाई को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देख रही है। और हर हाल में इस सीट को जीतना चाहती है। इस जीत से नीतीश को ये कहने का मौका मिलेगा कि एनडीए में शामिल होने के उनके फैसले को जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिल गया दूसरी तरफ बीजेपी अपने कट्टर हिदुत्व की छवि को थोड़ा नरम कर सकेगी। क्योंकि अररिया लोकसभा मुस्लिम बहुल सीट है।

 

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