200 साल पहले हुए युद्ध पर पुणे और मुंबई में तनाव-आगजनी, कल महाराष्ट्र बंद

200 साल पहले हुए युद्ध पर पुणे और मुंबई में तनाव-आगजनी, कल महाराष्ट्र बंद

नई दिल्ली: पुणे के एक गांव भीमा कोरेगांव में जातीय हिंसा के बाद मुंबई और औरंगाबाद मे तनाव के हालात बन गए हैं। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने पूरे मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिये हैं। सोमवार को पुणे के भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा में राहुल नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस हिंसक झड़प में कई लोग घायल हुए थे। सीएम देवेंद्र फडणविस ने युवक की मौत की सीआईडी जांच के आदेश दिये हैं। 200 साल पहले यहां पेशवाओं को अंग्रेजों ने हराया था। इसी जीत का जश्न मना रहे थे दलित। युवक की मौत के विरोध में 8 दलित संगठनों ने कल यानि बुधवार को महाराष्ट्र बंद बुलाया है।

पेशवा पर जिस जीत का जश्न दलित मना रहे थे उसी के बाद विवाद बढ़ा और उसने हिंसक रुप ले लिया। 200 साल पहले दलितों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ाई में दलितों ने अंग्रेजों का  साथ दिया था। उसी जीत की 200वीं सालगिरह पर दलित शौर्य दिवस मना रहे थे। पुणे में हुई हिंसा के बाद महाराष्ट्र के 8 शहरों में तनाव के हालत बन गए।

1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भीमा में युद्ध हुआ था। जिसके 200 साल पूरे हुए थे। बताया जा रहा है इस मौके पर तकरीबन साढ़े तीन लाख दलित इकट्ठा हुए थे। हलांकि प्रशासन की तरफ से इसे लेकर काफी तैयारी भी की गई थी। प्रशासन की तरफ से पुलिस की 6 कंपनियां तैनात की गई थी।

अहमद नगर अकोला परभणी, औरंगाबाद में तनाव के हालात बन गए हैं। नवी मुंबई को जोड़ने वाली हार्बर लाइन चेंबूर में ठप हो गई है। औरंगाबाद और परभणी में बसों पर पथराव किया गया है। कई जगह वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।

क्या है भीमा कोरेगांव की लड़ाई ?

बीजीराव पेशवा द्वितीय की इस युद्ध में हार हुई थी। महार बटालियन के सैनिक इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से लड़े थे। पुणे-अहमद नगर के बीच कोरेगांव भीमा में ये युद्ध हुआ था। इस युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से 500 लड़ाके थे। जिनमें से 450 महार सैनिक थे। जबकि पेशवा बाजीराव द्वितीय के तकरीबन 28 हजार सैनिक थे। केवल 500 महार सैनिकों ने पेशवा के 28 हजार सैनिकों को हरा दिया था।

युद्ध में जीत के बाद महार सैनिकों को उनकी वीरता के लिए सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में एक स्मारक भी बनवाया गया। जिस पर महारों के नाम लिखे थे। उसके बाद से ही हर साल 1 जनवरी को दलित इस जगह पर शौर्य दिवस मनाते आ रहे हैं। लेकिन इसबार 200 साल पूरा होने पर बड़ी तादाद में तकरीबन साढ़े तीन लाख दलित इकट्ठा हुए थे। जबकि इससे पहले 30 से 40 हजार दलित पहुंचते थे।

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